दो हजार वर्षों की गरिमा: मथुरा की कालातीत ‘वेणी प्रसाधन’ कला, जो आज भी प्रचलित है

दो हजार साल से भी अधिक पुरानी ‘वेणी प्रसाधन’ हेयर अलंकरण परंपरा आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। मथुरा, जो प्राचीन काल में कला, व्यापार और धर्म का केंद्र था, ने यूनानी व गांधार कलाकारों को आकर्षित किया। मथुरा संग्रहालय में संरक्षित एक सुसज्जित राजकन्या की प्रतिमा, संभवतः महाक्षत्रप राजा राजूवला की रानी कम्बोजिका का चित्रण है। नीले शिस्ट पत्थर से बनी इस कलाकृति में अद्भुत केशरचना, पुष्पमाला और अलंकरण दर्शाए गए हैं। यह मथुरा की प्राचीन कला, संस्कृति और राजसी गौरव का प्रतीक है।

Aug 12, 2025 - 17:18
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दो हजार वर्षों की गरिमा: मथुरा की कालातीत ‘वेणी प्रसाधन’ कला, जो आज भी प्रचलित है
मथुरा संग्रहालय की कुछ मूर्तियों के चित्र, जिनमें से कुछ में वेणी को दर्शाया गया है। महाक्षत्रप राजूवला की रानी (पहली शताब्दी ईस्वी)। उसी प्रतिमा का पिछला भाग। एक महिला का सिर, कलात्मक रूप से संवारे गए बाल (कुषाण काल)। अशोक वृक्ष से फूल तोड़ती महिला (कुषाण काल)। तोरण शालभंजिका प्रतिमा का पिछला भाग (शुंग काल)। मिट्टी की प्रतिमा- मूड़े पर बैठी, दर्पण में देखते हुए अपने बाल संवारती महिला (शुंग काल) शामिल हैं।

-चोब सिंह वर्मा-

2000 साल बाद भी इसकी कालातीत मोहकता आज भी अपनी सुंदरता में बरकरार है। यह है ‘वेणी प्रसाधन’। हेयरस्टाइल ;वेणी’ -यानी यानी जूड़े या चोटी पर सजाई जाने वाली अलंकरण वस्तु, जो आज भी उतनी ही प्रचलित है जितनी दो हजार साल पहले थी।

पौराणिक और प्राचीन काल से सजी-संवरी वेणी को प्रेममुग्ध शिल्पकारों, चित्रकारों, कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और फोटोग्राफरों ने अपनी कलाकृतियों के माध्यम से भरपूर सराहा और महिमामंडित किया है।

उन दिनों (दो हजार साल पहले) मथुरा व्यापार, यातायात, धर्म और कला का एक जीवंत और प्रमुख केंद्र था, जिसने यूनानी और गांधार कलाकारों को अपनी कला निधि की ओर आकर्षित किया। मथुरा संग्रहालय में संरक्षित केंद्रीय प्रतिमा एक सुसज्जित राजकन्या को दर्शाती है, जिसकी केशरचना अद्भुत है।

गांधार कला की विशेषता है- शारीरिक संरचना का सूक्ष्म चित्रण, चेहरे के भाव और वस्त्रों की सिलवटों पर जोर। मथुरा के शिल्पकार पहली शताब्दी ईस्वी में ही यूनानी शैली की कला-रचनाएं बनाने में अत्यंत दक्ष थे। यह एक ऐसी कलाकृति है जिसमें शिल्प और कहानी, दोनों की परतें जुड़ी हुई हैं।

प्रतिमा के पीछे एक पुष्पमाला (व्रीथ) दिखाई देती है, जो पट्टियों से बंधी है और सजावटी लटों पर मनके और पुष्प आकृतियों के अलंकरण उसके पीठ पर लटकते हैं। कहा जाता है कि यह प्रतिमा महाक्षत्रप राजा राजूवला की रानी कम्बोजिका का चित्रण है, जिनका उल्लेख यमुना के तट पर स्थित सप्तऋषि टीले से प्राप्त एक सिंह-स्तंभ पर हुआ है। यह प्रतिमा नीले शिस्ट पत्थर की बनी है।

सिंह-स्तंभ पर खरोष्ठी लिपि में लिखा है कि महाक्षत्रप राजूवला की रानी ने यहां एक बौद्ध स्तूप और विहार का निर्माण कराया था। इससे उनके राजसी दर्जे का स्पष्ट पता चलता है।

ये सभी विवरण मेरी मथुरा पर आधारित पुस्तक से लिए गए हैं। मथुरा संग्रहालय के प्रति आभार, जो आज भी लगभग दस हजार मूर्तियों को संरक्षित किए हुए है। प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास का अद्वितीय भंडार, जो एक ही स्थान पर उपलब्ध है।

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। आपने कई पुस्तकें लिखी हैं)।

SP_Singh AURGURU Editor