कंगना की ‘गटर जेनरेशन’ टिप्पणी पर जिला जज का फैसला, रिवीजन खारिज; वादी जाएंगे हाईकोर्ट
आगरा। ‘गटर जेनरेशन’ टिप्पणी को लेकर अभिनेत्री एवं सांसद कंगना रनौत के विरुद्ध दायर रिवीजन जिला जज संजय कुमार मलिक ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर, विवादास्पद अथवा अमर्यादित टिप्पणी मात्र से आपराधिक कृत्य गठित नहीं होता। फैसले से असहमत परिवादी एवं राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
जिला जज संजय कुमार मलिक ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 19(1) और 19(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर, विवादास्पद अथवा अमर्यादित टिप्पणी नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है। इससे राजनीतिक और सामाजिक असहमति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन यह अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं बन जाती।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः किसी अपराध के संबंध में कानून को सक्रिय करने का अधिकार किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। लेकिन जहां विधि के अनुसार परिवादी का स्वयं पीड़ित अथवा व्यथित होना आवश्यक हो या शासकीय स्वीकृति अनिवार्य हो, वहां संबंधित कानूनी अपेक्षाओं की पूर्ति के बिना परिवाद पोषणीय नहीं होता।
जिला जज ने परिवादी की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पुत्र ध्रुव शर्मा का हाईस्कूल परीक्षा 2026 का प्रमाणपत्र दाखिल किया गया है। इसमें उसकी जन्मतिथि 31 अक्टूबर 2009 अंकित है। कंगना रनौत ने 27 जुलाई 2026 को विवादित टिप्पणी की थी। इस प्रकार टिप्पणी के समय परिवादी का पुत्र अवयस्क था।
अदालत ने कहा कि पुत्र के नीट परीक्षा में सम्मिलित होने अथवा नीट की परीक्षा में शामिल विद्यार्थियों के संबंध में की गई टिप्पणी से उसकी व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुंचने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। परिवादी ने यह भी नहीं बताया कि घटना के समय वह स्वयं अथवा उसका पुत्र घटनास्थल पर मौजूद थे।
आदेश में कहा गया कि कंगना रनौत की ओर से यदि कोई टिप्पणी की गई थी तो वह वहां उपस्थित विद्यार्थियों के संदर्भ में थी। किसी सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर अथवा विवादास्पद टिप्पणी से असहमति हो सकती है, लेकिन मात्र इस आधार पर अपराध गठित नहीं होता। इन्हीं आधारों पर अदालत ने रिवीजन को पोषणीय नहीं मानते हुए अंगीकरण के स्तर पर ही खारिज कर दिया। प्रकरण को प्रकीर्ण वाद के रूप में दर्ज करने का आदेश भी दिया गया।
परिवादी राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने अदालत के फैसले पर असहमति जताई है। उन्होंने दलील दी थी कि सार्वजनिक स्थान, समाचार पत्र अथवा सोशल मीडिया के माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष या समाज विशेष के प्रति अमर्यादित एवं अपमानजनक टिप्पणी करना दंडनीय अपराध हो सकता है।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल उनके परिवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों के सम्मान से जुड़ी है। वह इस मामले को आगे भी उठाते रहेंगे और जिला जज के निर्णय के विरुद्ध शीघ्र ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत करेंगे।