डीईआई में डीएससी-एनएससीः विज्ञान, दर्शन और धर्म के समन्वय से मानवता के भविष्य पर मंथन
आगरा। दयालबाग शैक्षिक संस्थान (डीईआई) में सोमवार, 15 सितम्बर 2025 को सातवाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन दयालबाग साइंस ऑफ कॉन्शसनेस (DSC) और 48वाँ नेशनल सिस्टम्स कॉन्फ्रेंस (NSC) का भव्य शुभारंभ हुआ। तीन दिवसीय यह सम्मेलन 15 से 17 सितम्बर तक भौतिक एवं आभासी (ऑफ़लाइन एवं वर्चुअल) दोनों स्वरूपों में आयोजित हो रहा है। इसमें देश-विदेश के वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, धर्मविदों और शोधकर्ताओं ने भाग लेकर चेतना, विज्ञान और समाज के भविष्य पर गहन विमर्श की शुरुआत की।
उद्घाटन सत्र में प्रार्थना और स्वागत भाषण
कार्यक्रम का आरंभ प्रार्थना और स्वागत भाषण से हुआ। मंच पर प्रो. आनंद श्रीवास्तव (कील यूनिवर्सिटी, जर्मनी), प्रो. सरूप रानी माथुर (एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका), प्रो. अपूर्व नारायण (यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ओंटारियो एवं वाटरलू, कनाडा), प्रो. प्रेम कुमार कालरा (अध्यक्ष, एसएसआई), प्रो. के. स्वामी दया (डीईआई) और प्रो. संजय भूषण (डीईआई) मौजूद रहे।
मुख्य उद्घाटन भाषण डीईआई निदेशक प्रो. सी. पटवर्धन ने दिया। अध्यक्षता कर रही प्रो. सरूप रानी माथुर ने चेतना की प्रकृति को विज्ञान, दर्शन और धर्म के साझा दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि ये तीनों प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयात्री हैं।
उन्होंने कहा, विज्ञान का लक्ष्य है थ्योरी ऑफ एवरीथिंग। दर्शन का लक्ष्य है यूनिफाइड मेटाफिजिकल सिस्टम। और धर्म का लक्ष्य है अल्टीमेट रियलिटी।
उन्होंने हुज़ूर साहबजी महाराज (राधास्वामी मत, दयालबाग के पांचवें पूज्य नेता) के 1935 के कथन को उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया कि सत्य, परम वास्तविकता और परमात्मा एक ही सर्वोच्च सत्ता के भिन्न नाम हैं।
विज़न टॉक
इसके बाद प्रो. प्रेम सरन सतसंगी साहब (अध्यक्ष, शिक्षा पर परामर्श समिति, दयालबाग) ने प्रेरणादायी विज़न टॉक प्रस्तुत किया। उन्होंने सिस्टम थ्योरी और अर्थशास्त्र के बीच गहरे संबंधों पर प्रकाश डालते हुए बड़े पैमाने की आर्थिक प्रणालियों में फिजिकल सिस्टम थ्योरी के अनुप्रयोग को समझाया।
उन्होंने विशेष रूप से प्रस्तुत शब्दावली (Glossary of Terms) के माध्यम से विद्युत अभियांत्रिकी, संचालन अनुसंधान, प्रबंधन विज्ञान और अर्थशास्त्र की जटिल अवधारणाओं को सरल बनाया। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. आनंद श्रीवास्तव ने की।
पूर्वाह्न सत्र
एनएससी प्लेनरी टॉक में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने वैश्विक व्यवस्था का संकट और मूल्य-प्रणाली के माध्यम से लचीलापन विषय पर वक्तव्य दिया। अध्यक्षता डीईआई के रजिस्ट्रार प्रो. आनंद मोहन ने की।
डीएससी कीनोट व्याख्यान में प्रो. पमी दुआ (पूर्व निदेशक, डीएसई एवं सदस्य प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद) ने प्रभाव की कला: आध्यात्मिक चेतना और स्मार्ट पावर” पर विचार रखे।
प्रो. मार्क जुएर्गेन्समेयर (कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा बारबरा) ने सतत विकास के लिए गांधीवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
दोपहर सत्र
24 चयनित प्रतिभागियों के पोस्टर सत्र में शोधकर्ताओं ने अपने कार्य प्रस्तुत कर विशेषज्ञों से संवाद किया।
इसके बाद प्रो. आंद्रेयास मुलर (कील यूनिवर्सिटी) ने “धार्मिक परंपराओं में भाषा से परे: क्रिश्चियन लिटर्जी से उदाहरण” विषय पर कीनोट दिया।
आमंत्रित व्याख्यानों में प्रो. दयाल प्यारी श्रीवास्तव (डीईआई) – “चेतना और वास्तविकता: सुरत-शब्द योग एवं क्वांटम भौतिकी”, श्रीमती प्रेम प्यारी दयाल (डीईआई) – “मोक्ष की प्राप्ति हेतु वर्तमान सतगुरु की आवश्यकता” और डॉ. बानी दयाल धीर (डीईआई) ने “नाटक से भक्ति तक: ‘शरणाश्रम का सपूत’ की व्याख्या” प्रस्तुत किए।
तीन व्याख्यानों से दिन का समापन
दिन का समापन तीन विशेष कीनोट व्याख्यानों से हुआ। प्रो. बालाचुंधर सुब्रमण्यम (हार्वर्ड मेडिकल स्कूल) – “चिंता और सूजन: क्या ध्यान से समाधान संभव है?, प्रो. नैन्सी कुक (एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी) – “मानव-केंद्रित बुद्धिमान मशीनों के लिए मानव-मशीन सहयोग” और प्रो. जैमी सी. गोर्मन (एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी) – “मानव-प्रौद्योगिकी प्रणालियों में टीम संज्ञान और अनुकूलन” पर व्याख्यान दिए।
डीएससी/एनएससी 2025 के पहले दिन विद्वानों ने एकमत से कहा कि मानवता के सामने उपस्थित जटिल चुनौतियों का समाधान केवल अंतःविषयी सहयोग और आध्यात्मिक चेतना के समन्वय से संभव है। सम्मेलन ने विज्ञान, दर्शन, धर्म और समाज के बीच नई राहें खोलने का संदेश दिया।