पृथ्वी दिवसः धरती मां का करुण क्रंदन, अंधाधुंध विकास की दौड़ में सूखती हरियाली, बढ़ता तापमान और खतरे में मानवता का भविष्य

आज अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस पर आत्मचिंतन का दिन है। अनियंत्रित औद्योगीकरण, शहरीकरण और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। बढ़ता तापमान, घटती हरियाली और बंजर होती जमीन भविष्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत हैं। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि उनके संरक्षण और पोषण को भी उतनी ही प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है।

Apr 22, 2026 - 13:17
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पृथ्वी दिवसः धरती मां का करुण क्रंदन, अंधाधुंध विकास की दौड़ में सूखती हरियाली, बढ़ता तापमान और खतरे में मानवता का भविष्य
Earth Day, Climate Crisis, Green Future, Environmental Protection

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले सोना…यह केवल गीत नहीं, बल्कि उस भारत की पहचान है जहां धरती को मां माना जाता है। लेकिन आज वही धरती मां कराह रही है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कहीं आने वाले समय में इंसान अन्न के लिए भी मोहताज न हो जाए।

22 अप्रैल यानि अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस भारत के लिए सिर्फ एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। जिस देश में धरती को मां का दर्जा दिया गया हो, वहां यदि उसी मां को सूखा, बंजर और वीरान बना दिया जाए, तो यह केवल दुर्भाग्य नहीं बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

आज औद्योगीकरण और शहरीकरण की अंधी दौड़ में हरियाली को बेरहमी से काटा जा रहा है। पेड़ों को खत्म कर धरती को नग्न अवस्था में लाया जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता के साथ अत्याचार करता है, तो समाज उसे हेय दृष्टि से देखता है, फिर जो लोग धरती मां को उजाड़ रहे हैं, उनके प्रति कानून और समाज दोनों को अपराधी जैसा ही कठोर रुख अपनाना चाहिए।

सिर्फ अपील ही नहीं, बल्कि ऐसे मामलों में न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर सरकार, अफसरों और आम जनता, तीनों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल उन दावों पर है, जहां एक-दो दिन में 22 लाख, 22 करोड़ पौधे लगाने की बात कही जाती है। अगर इतने पौधे लगाए जा रहे हैं, तो क्या हर साल उतनी ही संख्या में पेड़ों की कटाई भी हो रही है? और जो पौधे लगाए गए, उनमें से कितने वास्तव में जीवित हैं?

यह एक गंभीर प्रश्न है। क्या सूख चुके या उपेक्षा के कारण नष्ट हुए पौधों को पौध शिशु हत्या नहीं माना जाना चाहिए? जिस प्रकार एक शिशु को उचित पोषण और देखभाल मिलती है, तभी वह विकसित होता है, उसी प्रकार पौधों को भी संरक्षण चाहिए। यदि पौधे लगाकर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाए, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक तरह का अपराध है, जिस पर अभियोग दर्ज होना चाहिए।

आज हम बहुमंजिला इमारतों के निर्माण को विकास मान रहे हैं, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि यदि यही निर्माण पुराने ढंग से फैलाव में होता, तो शायद और भी अधिक हरियाली नष्ट होती। फिर भी यह तर्क हमें पर्यावरण विनाश के अपराध से मुक्त नहीं करता।

पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि औद्योगीकरण और शहरीकरण की एक सीमा तय होनी चाहिए। आज मैदानी क्षेत्रों में तापमान 50 डिग्री के करीब पहुंच रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पर्वतीय और धार्मिक स्थल भी इसी तपिश और पर्यावरणीय असंतुलन का शिकार हो जाएंगे।

जिस तेजी से लोग इन स्थलों की ओर बढ़ रहे हैं, वह उन्हें भी एक दिन मैदानी इलाकों जैसा संकटग्रस्त बना सकता है, जहां आपदाएं और पर्यावरणीय कमजोरी दोनों बढ़ेंगी।

अब समय केवल विचार का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है। सभी पर्यावरणविदों को सरकार के साथ मिलकर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत काम करना होगा। साथ ही न्यायालय की शरण लेकर राज्य सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि धरती मां का दोहन सीमित किया जाए और संतुलन बनाए रखा जाए।

अन्यथा आने वाला समय केवल भीषण गर्मी का ही नहीं, बल्कि हवा और पानी के संकट से जूझते नारकीय जीवन का संकेत दे रहा है, जहां इंसान जीने के लिए मूलभूत संसाधनों के लिए संघर्ष करेगा।

धरती मां को बचाना आज विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।

राजीव गुप्ता- ‘जनस्नेही’ कलम से

लोक स्वर, आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor