जनतंत्र की जड़ में शिक्षा: टंडन स्मृति व्याख्यान में गूंजा सवाल—डिग्री के साथ जागरूक नागरिक क्यों नहीं?

स्वतंत्रता सेनानी एवं कम्युनिस्ट नेता महादेव नारायण टंडन की 23वीं पुण्यतिथि पर आगरा में आयोजित स्मृति व्याख्यान में बार-बार यह बात उभरकर सामने आई कि शिक्षा को केवल नौकरी का माध्यम मानना जनतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि इसे समाज को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में विकसित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

Apr 6, 2026 - 19:42
 0
जनतंत्र की जड़ में शिक्षा: टंडन स्मृति व्याख्यान में गूंजा सवाल—डिग्री के साथ जागरूक नागरिक क्यों नहीं?
स्वतंत्रता सेनानी एवं कम्युनिस्ट नेता महादेव नारायण टंडन की 23वीं पुण्यतिथि पर सोमवार को आयोजित स्मृति व्याख्यान में मौजूद मुख्य अतिथि अपूर्वानंद, डॊ. जीयू कुरैशी, कामरेड पूरन सिंह और भावना जितेंद्र रघुवंशी।

आगरा। स्वतंत्रता सेनानी एवं कम्युनिस्ट नेता महादेव नारायण टंडन की 23वीं पुण्यतिथि पर आयोजित स्मृति व्याख्यान में ‘जनतंत्र में शिक्षा शास्त्र’ विषय पर गहन मंथन हुआ। माथुर वैश्य सभागार, पचकुइयां में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।

कार्यक्रम का शुभारंभ एसएन मेडिकल कॊलेज के पूर्व प्राचार्य डॊ. जी. यू. कुरैशी, अपूर्वानंद, कामरेड पूरन सिंह और भावना जितेंद्र रघुवंशी द्वारा कामरेड महादेव नारायण टंडन के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया।

विषय प्रवर्तन करते हुए जे. एन. टंडन ने कहा कि जनतंत्र में शिक्षा केवल सूचना का संचय नहीं, बल्कि विवेक, सहिष्णुता और विविधता को स्वीकार करने की क्षमता विकसित करती है। उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा स्वतंत्र, समावेशी और नैतिक नहीं होगी, तब तक जनतंत्र मजबूत नहीं हो सकता।

मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता अपूर्वानंद ने अपने विचार रखते हुए कहा कि शिक्षा केवल तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण विकसित करने का माध्यम है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का लक्ष्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो सवाल कर सकें, सोच सकें और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करें। रटने की प्रवृत्ति को उन्होंने शिक्षा के पतन का कारण बताया।

उन्होंने भाषा के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि छात्रों को अपनी भाषा में सोचने और अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए, तभी वे ज्ञान को आत्मसात कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा कभी तटस्थ नहीं होती, बल्कि पाठ्यक्रम, किताबें और शिक्षण पद्धति किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित होती हैं, इसलिए यह समझना जरूरी है कि क्या और क्यों पढ़ाया जा रहा है।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि शिक्षा सामाजिक न्याय का सशक्त माध्यम है और इसे जाति, धर्म और लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में काम करना चाहिए। शिक्षक की भूमिका पर जोर देते हुए वक्ताओं ने कहा कि शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संवादकर्ता होना चाहिए।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि अपूर्वानंद को स्मृति चिह्न ब्रिजेंद्र नारायण टंडन द्वारा भेंट किया गया। कार्यक्रम का संचालन हरीश चिमटी ने किया, जबकि आभार ज्ञापन कामरेड पूरन सिंह ने व्यक्त किया।

कार्यक्रम में दिल्ली से आए बलराम शर्मा की उपस्थिति विशेष रही, जिनके पास कामरेड महादेव नारायण टंडन द्वारा महात्मा गांधी का लिया गया दुर्लभ साक्षात्कार आज भी सुरक्षित है।

इस मौके पर रामनाथ गौतम, दिलीप रघुवंशी, डॉ. वी.आर. सेंगर, डॉ. राकेश भाटिया, डॉ. अजय कालरा, डॉ. अशोक शर्मा, डॉ. नसरीन बेगम, डॉ. अनुपमा शर्मा, डॉ. संजय चतुर्वेदी, राजीव सक्सेना, शरीफ उस्मानी, नीरज स्वरूप, शिवराज यादव, डॉ. पंकज नागाइच, डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ, डॉ. एस.एस. सूरी, डॉ. अनूप दीक्षित, डॉ. सुधीर धाकरे, डॉ. विजय कत्याल, डॉ. मुकेश भारद्वाज, रामनाथ शर्मा, सीमंत साहू, अमीर अहमद, रमेश पंडित, डॉ. रजनीश गुप्ता, मोहित शर्मा, डॉ. मधुरिमा शर्मा, नीरज मिश्रा, डॉ. मुनिश्वर गुप्ता, डॉ. अरुण चतुर्वेदी, डॉ. हरि सिंह यादव, डॉ. ओ.पी. यादव सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

SP_Singh AURGURU Editor