छठ महापर्व के तीसरे दिन आगरा -टूंडला समेत देशभर में सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया गया
आगरा। छठ महापर्व चार दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत पवित्र और कठोर अनुष्ठान है, जिसकी शुरुआत 25 अक्टूबर 2025 को 'नहाय-खाय' से हुई। आगरा-टूंडला समेत पूरे देश में आस्था के साथ महपर्व को मनाया जा रहा है।
इइस महापर्व के दौरान व्रती स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। पर्व का दूसरा दिन, 26 अक्टूबर को 'खरना' किया गया, जब दिनभर का निर्जला व्रत सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर से तोड़ा गया। तीसरा दिन, 27 अक्टूबर, सबसे महत्वपूर्ण रहा, जिसे 'संध्या अर्घ्य' कहा जाता है। देश के कई राज्यों में संध्या के समय भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया गया।
हिंदू धर्म में छठ महापर्व का विशेष महत्व है, जो भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित है। यह त्योहार भक्ति, संयम और पवित्रता का प्रतीक है। वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास की षष्ठी तिथि से शुरू होने वाला यह चार दिवसीय पर्व इस साल 25 अक्टूबर 2025 से शुरू होकर 28 अक्टूबर 2025 को समाप्त होगा।
आगरा में भी छठ पूजन के लिए यमुना के घाटों पर खास व्यवस्था की गई थी। कैलाश मंदिर, बल्केश्वर, हाथी घाट आदि स्थानों पर सफाई कराई गई और प्रकाश की विशेष व्यवस्था थी। दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने छठ पूजा के अवसर पर लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि छठ एकता, पवित्रता और भक्ति का पर्व है। मुख्यमंत्री ने खरना पूजा में भी हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि छठ सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक चमकदार प्रतीक है जो सद्भाव, स्वच्छता और विश्वास का संदेश देता है। यह अनुशासन, ईमानदारी और सामूहिक सद्भावना को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा- छठ के महापर्व के दौरान खरना पूजा के पावन अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। व्रत रखने वाले सभी लोगों को मेरा सादर प्रणाम! भक्ति और अनुशासन के प्रतीक इस पावन अवसर पर गुड़ से बनी खीर के साथ सात्विक प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है। मेरी कामना है कि इस अनुष्ठान पर छठी मैया सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
छठ महापर्व संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि, और आरोग्य की कामना के लिए किया जाता है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है। छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन माना जाता है। इस व्रत को करने से चर्म रोग और नेत्र रोग दूर होते हैं, तथा व्यक्ति को तेज और ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
पर्व के चौथे और अंतिम दिन, जिसे 'पारण का दिन' भी कहते हैं, व्रती सूर्योदय से पहले ही उसी घाट पर पहुंच जाती हैं। इस दिन सुबह 6 बजकर 30 मिनट के आस-पास (शहर के अनुसार समय में अंतर हो सकता है), व्रती उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देती हैं। यह अर्घ्य नए दिन, नई शुरुआत और ऊर्जा के देवता के प्रति सम्मान प्रकट करता है। इस अर्घ्य के बाद, व्रती जल ग्रहण करके और प्रसाद खाकर अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत खोलती हैं, जिसे पारण कहा जाता है।