एग्जिट पोलः बीएमसी समेत महाराष्ट्र के सभी नगर निगमों में भाजपा नीत महायुति के दबदबे के संकेत, ब्रांड ठाकरे पर संकट के बादल
मुंबई। महाराष्ट्र में मुंबई महानगर पालिका सहित 29 नगर निगमों के लिए 15 जनवरी को हुए मतदान के बाद सामने आए एग्जिट पोल ने प्रदेश की शहरी राजनीति, खासकर मुंबई की दिशा का स्पष्ट संकेत दे दिया है। अधिकांश सर्वेक्षणों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली महायुति को निर्णायक बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। बीएमसी में महायुति को 125 से 150 मिलने का अनुमान एग्जिट पोल जता रहे हैं। इस प्रकार देश की सबसे प्रभावशाली नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) में सत्ता परिवर्तन की प्रबल संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो यह ब्रांड ठाकरे के अस्तित्व पर सवाल जैसा होगा।
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सत्ता की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। 15 जनवरी को हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव के बाद सामने आए लगभग सभी एग्जिट पोल भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति को स्पष्ट और निर्णायक बढ़त देते दिख रहे हैं। रुझानों के मुताबिक, यदि यही परिणाम मतगणना में भी दोहराए गए तो देश के सबसे समृद्ध नगर निगम में पहली बार भाजपा का मेयर बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।
एग्जिट पोल के रुझानों के अनुसार, मुंबई महानगर पालिका में भाजपा और सहयोगी दलों का प्रदर्शन मजबूत बताया जा रहा है। अनुमान है कि महायुति गठबंधन यहां बहुमत के करीब या बहुमत पार कर सकता है, जबकि विपक्षी खेमे, जिसमें उद्धव ठाकरे की शिवसेना, कांग्रेस और अन्य दल शामिल हैं, को अपेक्षाकृत कम सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है। यह चुनाव शहरी मतदाताओं के मूड और संगठनात्मक मजबूती का बड़ा पैमाना माना जा रहा है।
29 नगर निगमों में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। कुल मतदान प्रतिशत लगभग 46 से 50 प्रतिशत के बीच रहा, जो पिछले स्थानीय निकाय चुनावों के औसत के अनुरूप है। मुंबई जैसे महानगर में भी मतदाताओं की भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत के आसपास दर्ज की गई, जिसे राजनीतिक दलों ने सामान्य माना है।
राजनीतिक दृष्टि से बीएमसी का परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिवसेना के विभाजन के बाद यह पहला बड़ा शहरी चुनाव है, जिसे ठाकरे बंधुओं के लिए सियासी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। खासकर तब जब मराठी अस्मिता के नाम पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने हाथ मिला लिया। इसके बाद भी ठाकरे बंधु बीएमसी में करिश्मा नहीं दिखा पाए तो यह ब्रांड ठाकरे के दरकने के संकेत होगा। वहीं महायुति के लिए यह शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ को निर्णायक रूप से स्थापित करने का अवसर है। एग्जिट पोल के संकेत बताते हैं कि शहरी मतदाता स्थिरता, विकास और संगठनात्मक ताकत के पक्ष में झुकता नजर आ रहा है।
मतगणना 16 जनवरी 2026 की सुबह शुरू होगी। अंतिम नतीजे ही तस्वीर पूरी तरह साफ करेंगे, लेकिन एग्जिट पोल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में बड़ा बदलाव आकार लेता दिख रहा है और विपक्ष के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
राज ठाकरे से हाथ मिलाने के बाद भी अगर उद्धव ठाकरे बीएमसी पर अपना कब्जा बरकरार रखने में नाकाम रहे तो पहले ही संकट से जूझ रही शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा झटका होगा। बता दें कि बीएमसी पर पिछले 25 साल से अधिक समय से शिवसेना का कब्जा चला आ रहा है।
करीब दो दशक बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे बीएमसी चुनाव में साथ आए। दोनों ने मराठी अस्मिता, भाषा विवाद और बड़े कॉरपोरेट प्रभाव जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इसके विपरीत भाजपा ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व और विकास कार्यों को अपना मुख्य आधार बनाया, जबकि शिंदे गुट ने प्रशासक काल में हुए कामकाज को जनता के सामने रखा।
जहां ठाकरे खेमे ने हिंदी–मराठी विवाद और स्थानीय पहचान को चुनावी मुद्दा बनाया, वहीं महायुति ने बुनियादी ढांचे, नगर सेवाओं और योजनाओं की उपलब्धियों पर जोर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरी मतदाताओं ने विकास और स्थिर प्रशासन को प्राथमिकता दी।
बीएमसी में वर्ष 1996 से अविभाजित शिवसेना का वर्चस्व रहा है। 2022 में चुनी हुई बॉडी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से नगर निगम प्रशासक के अधीन चल रहा था। ऐसे में यह चुनाव न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना लेकर आया है, बल्कि मुंबई की शहरी राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत भी माना जा रहा है।
बीएमसी में कुल 227 वार्ड हैं और बहुमत के लिए 114 सीटें आवश्यक हैं। एग्जिट पोल संकेत दे रहे हैं कि भाजपा–शिंदे शिवसेना गठबंधन इस आंकड़े को पार कर सकता है। 2017 के चुनाव में भाजपा महज दो सीटों से शिवसेना से पीछे रह गई थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां बदली हुई नजर आ रही हैं।
चुनाव विश्लेषक प्रदीप गुप्ता के अनुसार, महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों में से 20 से अधिक मेयर भाजपा गठबंधन के हो सकते हैं। उनका कहना है कि इस चुनाव में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, विशेषकर लाडकी बहीण योजना, का असर शहरी क्षेत्रों तक दिखाई दिया है।