भारतीय संस्कृति का विश्व मंच पर विस्तार: ज्ञान परंपरा है भारत की अमूल्य थाती
आगरा। भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा : कल, आज और कल’ विषयक द्विसाप्ताहिक अंतरविषयी अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का समापन शनिवार को डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में हुआ। समापन सत्र में जुड़े अमेरिका, कनाडा और देशभर के विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा कि भारतीय संस्कृति की जड़ें जितनी गहरी हैं, उसका प्रभाव उतना ही दूरगामी है।
भारतीय संस्कृति अमेरिका में भी जीवंत—भानुश्री सिसोदिया
सैराक्यूस यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क से डॉ. भानुश्री सिसोदिया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अमरीका में कल भी चल रही थी, आज भी चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। हम कोशिश कर रहे हैं कि भारतीय संस्कृति और भाषा का परचम विदेशों में लहराता रहे। उन्होंने कहा कि दूसरे देश की संस्कृति का सम्मान करते हुए अपनी संस्कृति को साथ लेकर चलना ही सही भारतीयता है।
रामायण से अमेरिका में परिवार का पाठ पढ़ाते हैं—डॉ. कुसुम नैपसिक
ड्यूक यूनिवर्सिटी, नॉर्थ कैरोलिना से डॉ. कुसुम नैपसिक ने कहा कि वे अमेरिका में रामायण को उदाहरण बनाकर परिवार की भारतीय अवधारणा को बच्चों को सिखाती हैं। वहां की कक्षाओं में भारतीय संस्कृति और भाषा को पढ़ाना वह अपना धर्म मानती हैं।
हमारी संस्कृति में विज्ञान है, अंधविश्वास नहीं—प्रो. पूरनचंद टंडन
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. पूरनचंद टंडन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य को संवारने वाली है, न कि उसे तोड़ने वाली। हमारी परंपरा में ज्योतिष, धर्म, कर्म सब कुछ वैज्ञानिक तरीके से संरचित है। ज्ञान का उद्देश्य निर्माण है, विध्वंस नहीं।
अगर हमने खुद को न पहचाना तो संस्कृति खो देंगे—डॉ. अखिलेश निगम अखिल
पुलिस उपमहानिरीक्षक (सीआईडी) डॉ. अखिलेश निगम अखिल ने कहा कि भारतीय संस्कृति को हमने जानना और समझना छोड़ दिया है, इसी वजह से आज हमारी भाषाएं और परंपराएं संकट में हैं। जब तक हम स्वयं को महत्व नहीं देंगे, समाज भी हमें महत्व नहीं देगा।
सनातन परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत—प्रो. विनय पाठक
छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलपति प्रो. विनय पाठक ने कहा कि हम सभी भारतीय ज्ञान परंपरा के ऋषियों के ऋणी हैं। हजारों वर्ष बाद भी सनातन संस्कृति जीवंत है, यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। विचार भले अलग हों, लेकिन ऊर्जा एक ही दिशा में है।
अन्य वक्ताओं के विचार
वरिष्ठ आध्यात्मिक कवि गोपाल बघेल ‘मधु’ (कनाडा), वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक डॉ. राजीव द्विवेदी, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी निदेशक प्रो. संजय चौधरी ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नितिन सेठी ने किया। कार्यशाला के संयोजक एवं केएमआई इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने सभी वक्ताओं का परिचय दिया। कुलपति प्रो. आशु रानी ने गुरु-शिष्य परंपरा को इस कार्यशाला की आत्मा बताते हुए विद्यार्थियों से इस ज्ञान परंपरा के संवाहक बनने का आह्वान किया।