तथ्य गढ़े नहीं जाते, खोजे जाते हैं विरासत बचाने को प्रो. इरफ़ान हबीब की नसीहत, ‘ऐंटीक्युटीज ऑफ नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंस’ को मानें आधार
इतिहास गढ़ने की नहीं, सत्य को स्थापित करने की प्रक्रिया है और साक्ष्यों की अनदेखी इतिहास नहीं, भ्रम रचती है। यह बात मशहूर इतिहासकार प्रो. इरफ़ान हबीब ने अलीगढ़ में सिविल सोसायटी ऑफ़ आगरा के साथ चर्चा के दौरान कही। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदलने और राजनीतिक इतिहास की नयी व्याख्याओं के बीच जरूरी है कि भरोसेमंद दस्तावेजों और संस्थागत शोध पर आधारित इतिहास को संरक्षण मिले। इस संदर्भ में उन्होंने ‘मॉन्यूमेंटल ऐंटीक्विटीज़ ऑफ नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज़’ जैसे ऐतिहासिक प्रकाशनों को आधार मानकर पुरातात्विक संरक्षण के प्रयास करने पर जोर दिया।
आगरा/अलीगढ़। प्रख्यात इतिहासकार प्रो. इरफ़ान हबीब ने कहा कि इतिहास से तथ्यों को हटाया या बदला नहीं जा सकता। तथ्यों का निर्माण नहीं किया जा सकता, स्थापित तथ्य ही इतिहास का आधार होते हैं। उन्होंने यह टिप्पणी अलीगढ़ स्थित अपने आवास पर सिविल सोसायटी ऑफ आगरा के प्रतिनिधियों अनिल शर्मा, राजीव सक्सेना और असलम सलीमी से चर्चा के दौरान की।
इतिहास से छेड़छाड़: सरकारें हमेशा करती आई हैं
प्रो. हबीब ने कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की प्रवृत्ति नई नहीं है। कांग्रेस सरकारों के समय भी स्थानों के नाम बदले गए, लेकिन अब इसमें और तेजी देखी जा रही है। उनका कहना है कि इतिहासकारों का काम तथ्यों को खोजकर प्रस्तुत करना है, ना कि नए तथ्य गढ़ना।
उन्होंने एक बार फिर कहा- ‘हिस्टोरियन्स मस्ट प्रूव बाय एस्टैबलिशिंग फैक्ट्स, दे कैन्ट मैन्यूफैक्चर फैक्ट्स।‘
पुरातत्व व संरक्षण: फुटफॉल से ज्यादा महत्व साक्ष्य का
चर्चा के दौरान आगरा व अलीगढ़ के उपेक्षित स्मारकों और उनके संरक्षण की जरूरत पर भी विस्तृत विचार हुआ। उन्होंने पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा प्रकाशित दुर्लभ दस्तावेज ‘मॉन्यूमेंटल ऐंटीक्विटीज़ ऑफ नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज़’ का विशेष उल्लेख किया। यह प्रकाशन उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के अंतर्गत आने वाले छोटे-बड़े पुरा स्थलों का वर्गीकृत विवरण प्रस्तुत करता है, जिसमें संरक्षण योग और अति महत्वपूर्ण स्थलों की सूची शामिल है।
उन्होंने कहा कि “पुरातात्विक संरचनाएं केवल पत्थर नहीं, सांस्कृतिक साक्ष्य हैं, जिन्हें बचाना महत्वपूर्ण है। यह जिम्मेदारी केवल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या राज्य पुरातत्व विभाग की नहीं, बल्कि नागरिक समूहों, इतिहास शोधकर्ताओं की भी है।
अलीगढ़ का खोता हुआ इतिहास: मराठा स्मृति पर संकट
प्रो. हबीब ने कहा कि अलीगढ़ में मराठा और रियासत काल के कई स्मारक अब या तो खंडहर हो चुके हैं, या नष्ट कर दिए गए हैं। अलीगढ़ किले के केवल कुछ हिस्से ही बच पाए हैं। उन्होंने कहा कि मराठा शासक महादजी सिंधिया के समय में शहर का नामकरण हुआ था, पर अब उस इतिहास की संरचनाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं।
ब्रज का इतिहास: हबीब का प्रमुख योगदान
बरसों तक मुगल और प्राचीन भारतीय इतिहास पर शोध करते आए प्रो. हबीब ने अपनी कम चर्चित परंतु बेहद मूल्यवान पुस्तक ‘मुगल काल में ब्रज भूमि: राज्य, किसान और गोसाईं’ का भी जिक्र किया। यह ग्रंथ बंगाली इतिहासकार तारापद मुखर्जी के साथ सह-लेखन में प्रकाशित हुआ और ब्रज भूमि की सामाजिक-आर्थिक और धर्म-संस्कृति के विस्तृत दस्तावेजी अध्ययन पर आधारित है।
तेरह मोरी बांध व जलसंरक्षण: ऐतिहासिक संरचना का आधुनिक उपयोग
सिविल सोसायटी ऑफ आगरा के सचिव अनिल शर्मा ने बताया कि वे प्रो. हबीब से तेरह मोरी बांध के संरक्षण के मुद्दे पर चर्चा करने पहुंचे थे। यह बांध फतेहपुर सीकरी के संरक्षण क्षेत्र का अभिन्न भाग है। पुरातत्व सर्वेक्षण संगठन ने इसे ऐतिहासिक स्मारक मानकर उसे फिर से उपयोगी बनाए जाने की अनुमति सिंचाई विभाग को दे दी है। प्रो. हबीब ने बताया कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने इस बांध पर विस्तृत अध्ययन कर ‘चाह ब चाह: द टेक्नीक ऑफ़ वाटर-लिफ्टिंग ऐट फतेहपुर सीकरी’ नामक शोधपत्र प्रकाशित किया है।
इतिहास के लिए जरूरी है सत्य, साक्ष्य और संवेदनशील संरक्षण
चर्चा के अंत में प्रो. हबीब ने इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज से नसीहत भरे लहजे में कहा, जो बचा है, उसे बचाएं। हर संरचना हमारा साक्ष्य है, और हर साक्ष्य भविष्य की शिक्षा।
उन्होंने कहा कि सही इतिहास वही है जिसके पीछे दस्तावेज़, साक्ष्य और अनुसंधान खड़े हों।