आजादी की फॉल्ट लाइनें: 1857 से नेताजी तक अंग्रेजों की रणनीति और कांग्रेस का रोल

आज हम आजाद हैं, लेकिन कुछ फॉल्ट लाइनें आज़ादी के बाद भी बनी रहीं। 1857 के विद्रोह ने अंग्रेजों को सावधान किया और इसके बाद कांग्रेस की स्थापना हुई, जो जन-समुदाय से जुड़कर अंग्रेजों की नज़र में ‘संतुलन’ बनी। कुछ युवाओं को इंग्लैंड भेजकर जनता को नियंत्रित मार्ग पर चलाने का प्रयास हुआ। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आईसीएस की नौकरी छोड़कर देश की आज़ादी को सर्वोच्च लक्ष्य बनाया। आजादी के बाद भी इतिहास में छुपी अंग्रेजों की रणनीति और कांग्रेस के भीतर के रुझान फॉल्ट लाइनें बनी रहीं।

Aug 15, 2025 - 21:34
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आजादी की फॉल्ट लाइनें: 1857 से नेताजी तक अंग्रेजों की रणनीति और कांग्रेस का रोल

-डॉ. (लैफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

आज हम आजाद हैं, परन्तु कुछेक फॉल्ट लाइनें बनी रह गई हैं। और यह भी उतना ही सत्य है कि आज़ादी के पश्चात बहुत पानी सन 1947 से बह भी चुका है गंगा, जमुना, कृष्णा, कावेरी, ब्रह्मपुत्र में। आज हम बहुत सारी बीती बातें भुला भी चुके हैं। जो कुछ हम जानते और समझते हैं, वह ऐसे इतिहासकारों द्वारा परोसा गया है जिन्हें हम वामपंथी कहकर आसानी से दाएं-बाएं सरका देते हैं, और कुछ भरोसा अंग्रेजों द्वारा परोसे गए इतिहास पर भी आधारित है।

1857 के देशव्यापी आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक दिया, जिसने उन्हें आगामी समय के विषय में सोचने पर मजबूर कर दिया। दो उल्लेखनीय कार्य हुए इसके बाद।

प्रथम, नई खाटी पार्टी शुरू की गई, जिसे कांग्रेस का नाम दिया गया। यह प्रेशर कुकर पर लगे उस 'वेट' की तरह थी, जो 1857 जैसी फूटने वाली परिस्थितियों से बचाता था। जब कुकर में अत्यधिक गर्मी और गैस भर जाती, तो सीटी और वेट समय रहते गैस को रिलीज़ कर देते।

शुरुआत से ही कांग्रेस पार्टी जन-समुदाय से घुली-मिली थी, जिससे उसे सबसे पहले पता चल जाता कि क्या होने वाला है। ऐसे में अंग्रेजों को नई मुश्किल आने से पहले ही खबर मिल जाया करती थी और वे सुधार कर लेते थे।

दूसरा, कुछेक युवाओं को देश भर से चुनकर इंग्लैंड पढ़ने के लिए भेजा गया। जब हम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर अपनी किताब के लिए रिसर्च कर रहे थे, तब कई ऐसे नाम सामने आए, जिनका सीधा संबंध पढ़ाई कर लौटने के बाद जनता को एक तयशुदा रास्ते पर चलते रहने का मार्गदर्शन करने से था। नेताजी खुद आईसीएस (आज के आईएएस की अंग्रेजों के समय की पुरानी पीढ़ी) में चयनित होने के बाद नौकरी छोड़कर भारत लौट आए और देश को आज़ादी दिलाने का बीड़ा उठाया। उनके समक्ष भारत की आज़ादी ही पहला और आखिरी लक्ष्य था।

आज अंग्रेजों के इशारे पर चलने वालों का सच्चा स्वरूप उन सभी लोगों की जीवनी पर शोध से उजागर हो सकता है। ऐसा नहीं कि जो भी यूनाइटेड किंगडम से पढ़कर लौटे, वे सभी अंग्रेजों के पिट्ठू थे। परन्तु उन पर अंग्रेजी हुकूमत का हल्का सा रंग तो चढ़ ही चुका था।

लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार पूर्ण आज़ादी की मांग उठी थी। परन्तु उससे पहले कलकत्ता के अधिवेशन में उस समय के प्रमुख ने अंग्रेजी हुकूमत के अंतर्गत रहने की बात स्वीकार की थी, जिसका नेताजी सुभाष ने खुलकर विरोध किया। ऐसा नहीं हो सकता कि कांग्रेस के तब के अध्यक्ष अपनी मनमानी प्रस्तुत कर सकते, जब तक कि तब की कांग्रेस के प्रमुख व्यक्तियों की स्वीकृति न होती।

तनिक इस विषय पर अब थोड़ा सोचिए। कुछेक जो फॉल्ट लाइनें आज़ादी के बाद भी बनी रहीं, उन्हें तभी समझ पाएंगे जब अंग्रेजों का खेला समझ सकेंगे।

(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं और आपने कई पुस्तकें भी लिखी हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor