क्लासरूम से कॉरिडोर तकः भारत के एलीट स्कूलों में Gen Z की गाली गैलैक्सी पर सीबीएसई ने बजाई घंटी
भारत के महंगे और प्रतिष्ठित स्कूलों में बच्चों की भाषा तेजी से बिगड़ रही है। Gen Z के छात्र रोज़मर्रा की बातचीत में भारी मात्रा में गालियों और चार-अक्षरी अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ओटीटी, सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट ने अभद्र भाषा को “न्यू नॉर्मल” बना दिया है। सभ्य भाषा, साहित्य, शायरी और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित एक नए काउंटर-कल्चर की तत्काल जरूरत है, ताकि युवा भाषा की सुंदरता और शक्ति को फिर से समझ सकें।
-बृज खंडेलवाल-
एक अरसे बाद, मैं अपने ग्रैंडसन को लेने स्कूल पहुँचा। छुट्टी में वक्त था, सोचा एक चक्कर लगा लूँ। तभी मोड़ पर 7–8 बच्चे दिखे, एक एलीट स्कूल के चकाचौंध भरे कॉरिडोर में और उनकी भाषा सुनकर कान सुन्न पड़ गए। Gen Z की तेज़, कटी-कटी, इमोजी-टपकाती जुबान… और हर वाक्य में (four letter word) चार-अक्षरों की आग।
“अरे यार, आज क्लास में तेरी तो पूरी _ हो गई!”
मैडम ने पूछा photosynthesis क्या है, और तुमने बोला, ‘जब chlorophyll वाली _ धूप में खुल जाती है!’
“ओए, तुम मत बोलो! तुम्हारी हिंदी सुनकर प्रेमचंद भी शरमा जाए!”
“आवाज़ कम करो, वरना प्रिंसिपल हमारी _ में डाल देगा!
फेक हँसी उस एलीट स्कूल की पॉलिश्ड ग्रेनाइट दीवारों से टकराकर लौटी , वही स्कूल जिसकी सालाना फीस हाथरस में एक छोटे घर के दाम के बराबर है। इस ‘मज़ाक’ पर दीवारें भी शर्माती होंगी। एयरपॉड लगाए एक लड़की बोली, “गाइज, कल Mirzapur ड्रॉप है। पूरा गाली मैराथन! पॉपकॉर्न और अपनी बहन का लॉन्ड्री पैक कर लो!”
पास में स्टाफ रूम के अंदर बैठी एक 52 साल की अध्यापिका ने ऊपर देखा, कलम अधूरी तरह से रुकी। उन्होंने पीढ़ियों को शेक्सपियर और सरोजिनी नायडू पढ़ाई थी, और आज शायद उसको हर सात में से सिर्फ़ एक-आध ही शब्द समझ आया। बाकी दो शिक्षकों की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं , उस नज़र में कोई अनुवाद न चाहिए था: असहायपन, घृणा, और वह खामोश दहशत कि जिस भाषा की उन्होंने जिंदगी भर रखवाली की, वह अब कॉरिडोर में, अक्रोनिम्स और इमोजी में, काट-छाँट कर ऐसी चीज बन चुकी थी जिसे वे पहचान भी नहीं पा रहे थे। बस इतना कह पाए, भाषा हमसे छिन चुकी है।
इधर, CBSE का नवंबर 2025 का सर्कुलर, “अभद्र भाषा पर रोक” व्हाट्सऐप ग्रुप में छह मिनट में मीम बन गया, उस पर भी गालियाँ लिपटी हुईं।
भारत अब उस मोड़ पर है जहाँ इसके सबसे महँगे स्कूलों की संगमरमर-सी कॉरिडोर भी उन्हीं चार-अक्षरी अपशब्दों की गूँज सुनाती हैं जो OTT वेब-सीरिज़ और इंस्टाग्राम रील्स से आती हैं।
CBSE का नवम्बर 2025 की एडवाइजरी , स्कूलों में अपशब्दों के बढ़ते इस्तेमाल पर , इसलिए एक तरह से अलार्म है, न कि सिर्फ़ रोज़मर्रा का सर्कुलर; यह एक संस्था की आवाज़ है जो याद दिलाती है कि शिष्टाचार का लेवल क्या हो। शिक्षक बताते हैं कि टीनएजर, खासकर प्रिविलेज्ड शहरी और सेमी-अर्बन अंग्रेज़ी-माध्यम स्कूलों के छात्र, रोज़मर्रा के वाक्यों में गालियाँ उसी तरह छिड़क देते हैं जैसे पिछली पीढ़ियाँ “जी” या “प्लीज़” का इस्तेमाल किया करती थीं। लिंग अब किसी फ़िल्टर की तरह काम नहीं कर रहा; लड़कियाँ भी उतनी ही बेपरवाह होकर हिंदुस्तानी और अंग्रेज़ी गालियाँ इस्तेमाल कर रही हैं जितना लड़के करते हैं। जिन शब्दों पर कभी वर्जना थी, खासकर महिलाओं के ख़िलाफ़ वाले, वे टैबू अब ढह चुके हैं। गालियाँ अब विद्रोह का निशान नहीं रहीं; वे आम बोलचाल का डिफ़ॉल्ट अंदाज़ बन गई हैं। छोटे वाक्य, अचानक कैपिटलाइज़ेशन और इमोजी क्लस्टर ने व्याकरण की ........दी है। एक पूरी पीढ़ी की अभिव्यक्ति-सीमा सिकुड़ रही है जबकि गाली-शब्दों का शब्दकोश बढ़ रहा है।
सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उन्होंने अपशब्द बनाए, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उन्हें न्यू नॉर्मल बना दिया। मोनेटाइज़ किया, और नाबालिगों तक उसका एल्गोरिदमिक सटीकता से पहुँचाया। देहरादून या दिल्ली का तेरह साल के बच्चे को अब बस यार-यार के adda पर जाकर रंगीन गालियाँ सीखने की ज़रूरत नहीं; Mirzapur, Sacred Games और अनगिनत यूट्यूब रिएक्शन चैनल हाई-डेफ़िनिशन में वही भाषा दे देते हैं, जो उनको सूट करे। संदेश साफ़ है: कूल होने का मतलब अब सिर्फ़, हेट स्पीच, घृणास्पद बोलना है।
नतीजे सिर्फ़ पेरेंट-टीचर मीटिंग में शरमिंदगी तक सीमित नहीं रहते। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि लगातार एक्सपोज़र शब्दों के भावनात्मक वजन से बोलने वालों को सुन्न कर देता है। सहानुभूति सिकुड़ती है। वह बच्चा जो हल्के-फुल्के अंदाज़ में किसी सहपाठी को सबसे भद्दे शब्द कह देता है, पहले से ही जीरो मानवीयकरण की तरफ बढ़ रहा है। जब हर कोई मज़ाक में MC, BC या “रंडी” जैसा शब्द इस्तेमाल करता है तो संस्कार और शिष्टाचार गए भाड़ में। अनुशासन ढीला पड़ जाता है, शिक्षक नैतिक अधिकार खो देते हैं, और स्कूल — वह आख़िरी सार्वजनिक जगह जहाँ सभ्यता लागू होती थी , एग्रेसिव एग्जिबिशनिज्म, प्रदर्शनकारी आक्रामकता का और एक मंच बन जाता है।
माँ-बाप, असहाय और कुछ-हद तक हिस्सेदार, अक्सर हार मान लेते हैं। कई ऐसे हैं जो खुद के पहले भारतीय पीढ़ी हैं जिन्होंने, mtv, केबल टीवी और शुरुआती इंटरनेट फोरम पर पाली-बढ़ी; वे अपने बच्चों को सुधारने का नैतिक आत्मविश्वास खो चुके हैं। कुछ लोग शिकायत करने से डरते हैं कि उन्हें “रुढ़िवादी” कहा जाएगा अगर वे ‘नए इंडिया’ की भाषा पर आपत्ति जताएँ। स्कूल, प्रोग्रेसिव और डिजिटल-फ्रेंडली दिखने के दबाव में, भाषाई निगरानी छोड़ चुके हैं। नतीजा एक ख़ालीपन है जिसे स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स और पीयर ग्रुप्स ने खुशी-खुशी भर दिया।
CBSE की सलाह-परामर्श भली और संतुलित है, पर उसकी सिफारिशें (काउंसलिंग सेशंस, पेरेंट-टीचर संवाद, अवेयरनेस वर्कशॉप्स) डिजिटल संस्कृति की ज्वार-लहर के सामने शायद अपर्याप्त लगती हैं। सिर्फ़ काउंसलिंग से उस शब्दकोश को नहीं मिटाया जा सकता जिसे लाइक्स, सब्सक्राइबर और सोशल कैपिटल इनाम देते हैं। जरूरी है एक सक्रिय, मेहनती काउंटर-फ़ॉर्मेशन: शालीन भाषा, साहित्य, शायरी, धर्मग्रंथ, औपचारिक पत्र-लेखन, एलोकेशन — कुछ भी जो युवा कानों को याद दिलाए कि भाषा खूबसूरत, सटीक और ताक़तवर हो सकती है बिना अश्लील हुए।
भाषा का भावनात्मक वजन खत्म। सहानुभूति घट रही है। MC–BC को मज़ाक समझने वाले बच्चे धीरे-धीरे दूसरों को मनुष्य की तरह देखना भूल रहे हैं। स्कूल अनुशासन खो रहे हैं, शिक्षक नैतिक अधिकार, और माँ-बाप हिम्मत।
CBSE की सलाह—काउंसलिंग, वर्कशॉप, पेरेंट-टीचर संवाद—ज़रूरी तो है, पर डिजिटल आँधी के सामने नाकाफी।
ज़रूरत एक नए काउंटर-कल्चर की है, भाषा की शुद्धता, साहित्य की मिठास, शायरी की लय, कथाओं की तहज़ीब, और यह याद दिलाने की कि खूबसूरत भाषा भी ताक़तवर होती है, बिना गाली के। पता नहीं!!