गुनगुनाहट से शोर तक: बॉलीवुड संगीत की रूह कहाँ खो गई? -
कैसे कभी बॉलीवुड संगीत ज़िंदगी की धड़कन हुआ करता था। सादगी, शायरी और सुरों के साथ, और आज वह ज़्यादातर शोर, बीट्स और ट्रेंड की दौड़ में सिमट गया है। पुराने गीत दिल से निकले और दिल तक पहुंचे, जबकि आज के अधिकांश गाने वायरल होने के लिए बनाए जाते हैं। कुछ अपवाद अब भी उम्मीद जगाते हैं, पर असली संगीत वही है जो ख़ामोशी में भी असर छोड़ जाए। गुनगुनाने लायक़ गीतों की कमी ही आज की सबसे बड़ी पीड़ा है।
-बृज खंडेलवाल-
दो दिन पहले, मैं फिल्म धुरंधर देख कर लौट रहा था, रास्ते में गुप्ता अंकल ने पूछ लिया, फिल्म का कौन सा गाना पसंद आया? "शोरीले यातना चैंबर से निकल कर आया हूं, सुरीले संगीत की आत्मा का तेल निकलवा कर," मैने झुंझलाते हुए कहा। अगली सुबह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, एक बुजुर्ग फैक्ट्री मालिक से सीएच आत्मा का गुजरे जमाने का गीत सुनकर पब्लिक का दिल बाग बाग हो गया। "चलो न गोरी मचल मचल कर, अभी तो बाला पन है।"
नए पुराने संगीत के बारे में सोचते हुए घर लौटा तो बाथरूम से भूकंप के झटके आ रहे थे, भतीजा नहाते हुए गा रहा था, बदतमीज दिल, मांगे मोर, मांगे मोर। " क्या आफत है भई, कोई लग जा गले, टाइप गाना क्यों नहीं गाते," मैने सुझाव दिया।
खैर, इसी विषय पर कई मित्रों से दिन भर चर्चा होती रही। एक दृष्टिकोण था कि शादी की बारात में जो गाने बैंड वाले बजाएं, वोही आल टाइम पॉपुलर हिट्स माने जाते हैं, जैसे बहारो फूल बरसाओ, आज मेरे यार की शादी है, छोड़ बाबुल का घर, आदि।
एक ज़माना था जब बॉलीवुड का संगीत सिर्फ़ सुनाई नहीं देता था, वह ज़िंदगी का हिस्सा हुआ करता था। गाने फ़िल्म के साथ खत्म नहीं होते थे, वे हमारे साथ चलते थे, रेल की लंबी यात्राओं में, रेडियो पर बिनाका गीत माला से आती धीमी आवाज़ में, गर्मियों की दोपहर की खुली खिड़कियों से, और बिना सोचे-समझे बाथरूम में गुनगुनाते हुए।
तब गानों को चलाने के लिए बड़े स्पीकर, नाच-गाना या तेज़ आवाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। सुर और जज़्बात ही काफी होते थे।
1950 से 1980 के दशक तक का दौर बॉलीवुड संगीत का सुनहरा समय था। एस. डी. बर्मन, मदन मोहन, आर. डी. बर्मन, नौशाद और लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल जैसे संगीतकार समझते थे कि धुन दरअसल दिल की आवाज़ होती है। साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, गुलज़ार और आनंद बक्शी जैसे शायरों ने ऐसे बोल लिखे जो सीधे दिल में उतर जाते थे। गाना आपका न भी हो, फिर भी लगता था, ये तो मेरी कहानी है। तलत महमूद का वो गाना, हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं, बयां करता है हर दिल की कशिश, और तन्हाई की वेदना।
“लग जा गले” को ही लीजिए। न ज़ोरदार ढोल, न कान फाड़ने वाली धुन। बस एक दर्द, एक कसक, और ये एहसास कि शायद ये पल फिर न आए। या “अभी न जाओ छोड़कर”, कितनी नज़ाकत से कही गई मोहब्बत की बात।
ख़ुशी के गाने भी कितने सादे थे, “ये शाम मस्तानी”, “आज फिर जीने की तमन्ना है”, “चौदहवीं का चाँद हो”। साइकिल चलाते हुए सीटी में बज जाएँ, बस का इंतज़ार करते हुए होंठों पर आ जाएँ। ये गाने ध्यान नहीं माँगते थे, ख़ुद जगह बना लेते थे। सबसे बड़ी बात, ये गाने बिना तस्वीरों के भी ज़िंदा रहते थे। आँख बंद कीजिए, एहसास पहुँच जाता था।
अब ज़रा आज के बॉलीवुड संगीत को देखिए। ज़्यादातर गाने तेज़, बेचैन और शोर से भरे हुए हैं। वे आपको बुलाते नहीं, आप पर हमला करते हैं। भारी बीट्स, इलेक्ट्रॉनिक आवाज़ें, ऑटो-ट्यून, बार-बार दोहराए जाने वाले बोल, और आधी-अधूरी अंग्रेज़ी, जैसे संगीत नहीं, कोई विज्ञापन चल रहा हो। “घुंघरू”, “स्वैग से स्वागत”, “दिलबर” (रीमिक्स), ये सब क्लब, रील और चार्ट के लिए बने हैं, तन्हाई, ख़ामोशी या यादों के लिए नहीं।
पहले गाने ज़िंदगी के लम्हों को बयान करते थे। आज के गाने वायरल होने के लम्हे पकड़ने की कोशिश करते हैं।
दर्द भी बदल गया है। पहले दर्द धीमे-धीमे उतरता था, “जाने वो कैसे लोग थे”, “कोई हमदम न रहा”, “चिंगारी कोई भड़के”। आज ग़म भी तेज़ बीट्स और बैकग्राउंड डांस के साथ परोसा जाता है। लगता है अब उदासी भी चिल्ला कर ही जतानी पड़ेगी।
हाँ, कुछ अपवाद ज़रूर हैं। अरिजीत सिंह के “तुम ही हो”, “अगर तुम साथ हो”, या अमित त्रिवेदी का “इकतारा” याद दिलाते हैं कि असली धुन अभी मरी नहीं है। लेकिन गौर कीजिए, ये गाने इसलिए चलते हैं क्योंकि इनमें पुराने ज़माने की सादगी और ठहराव है। ये रुकते हैं, सांस लेते हैं, ख़ामोशी की क़दर करते हैं। अफ़सोस ये है कि ऐसे गाने अब बहुत कम रह गए हैं।
पहले गाने कहानी का हिस्सा होते थे। फ़िल्म कुछ देर रुकती थी, ताकि किरदार और दर्शक दोनों कुछ महसूस कर सकें। आज ज़्यादातर गाने सिर्फ़ फ़िल्म बेचने, स्टेप दिखाने और ट्रेंड बनाने के लिए होते हैं। प्रचार खत्म, गाना खत्म।
देशभक्ति के गीत देख लीजिए। “ऐ मेरे वतन के लोगों” को ऊँची आवाज़ की ज़रूरत नहीं थी, आँखें अपने आप नम हो जाती थीं। “मेरे देश की धरती” किसान का गर्व बन गया। आज के ज़्यादातर देशभक्ति गीत शोर में जज़्बात को खो देते हैं।
दिक्कत ये नहीं कि संगीत बदल गया है, बदलना ज़रूरी है। दिक्कत ये है कि सुर और शायरी को गैरज़रूरी समझ लिया गया है। अच्छा गाना वो होता है जो बिजली चले जाने पर भी ज़िंदा रहे, उम्र के साथ भी साथ निभाए, और ख़ामोशी में भी अपना असर दिखाए। आज के ज़्यादातर बॉलीवुड गाने इस इम्तिहान में फ़ेल हो जाते हैं।
जब तक फ़िल्मकार और संगीतकार शोर को जोश और दोहराव को कशिश समझते रहेंगे, लोग पुराने गानों की तरफ लौटते रहेंगे, नॉस्टैल्जिया के लिए नहीं, सुकून के लिए। क्योंकि जब इंसान अकेला होता है, टूटा होता है, या बस इंसान होता है, तो उसे बीट नहीं चाहिए। उसे गुनगुनाने लायक़ एक गीत चाहिएBottom of Form
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