गुर्दों की सुरक्षा से लेकर ट्रांसप्लांट सफलता तक- आगरा के युवा नेफ्रोलॉजिस्ट डॊ. सुश्रत गुप्ता का इंटरनेशनल मंच पर धमाकेदार शोध, तीन अध्ययनों ने बदली इलाज की दिशा

आगरा के युवा नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. सुश्रुत गुप्ता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर शहर और देश का नाम रोशन किया है। इंटरनेशनल सोसाइटी ऒफ नेफ्रोलॊजी की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस, जिसका आयोजन जापानी सोसाइटी ऒफ नेफ्रोलॊजी द्वारा जापान के योकोहामा में किया गया, उसमें डॉ. गुप्ता ने अपने तीन महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत कर चिकित्सा जगत में नई दिशा दी। उनके शोधों के निष्कर्ष साफ संकेत है कि सही दवा और सटीक खुराक से न केवल मधुमेह से प्रभावित गुर्दों को बचाया जा सकता है, बल्कि ट्रांसप्लांट की सफलता दर भी बढ़ाई जा सकती है और आईजीए नेफ्रोपैथी जैसे जटिल रोगों की प्रगति को भी प्रभावी रूप से रोका जा सकता है।

Mar 31, 2026 - 18:13
Mar 31, 2026 - 18:13
 0
गुर्दों की सुरक्षा से लेकर ट्रांसप्लांट सफलता तक- आगरा के युवा नेफ्रोलॉजिस्ट डॊ. सुश्रत गुप्ता का इंटरनेशनल मंच पर धमाकेदार शोध, तीन अध्ययनों ने बदली इलाज की दिशा
जापान में हुई इंटरनेशनल कॊन्फ्रेंस में डॊ. सुश्रत गुप्ता, जिन्होने वहां अपने तीन शोध पत्र प्रस्तुत किये।

मधुमेह रोगियों के लिए ‘फिनरेनोन’ बना वरदान

कॊन्फ्रेंस में पढ़े अपने पहले शोध में डॉ. सुश्रुत गुप्ता ने बताया कि उन्होंने मधुमेह (डायबिटीज) के उन मरीजों पर अध्ययन किया, जिनमें वर्षों बाद गुर्दों की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है और पेशाब के जरिए प्रोटीन निकलने लगता है, जिसे प्रोटीन्यूरिया कहा जाता है।
इस अध्ययन में ‘फिनरेनोन’ दवा के उपयोग से यह पाया गया कि एक वर्ष के नियमित उपचार के बाद मरीजों में गुर्दों की फिल्टर करने की क्षमता में स्पष्ट सुधार हुआ और प्रोटीन्यूरिया में कमी आई। यह शोध मधुमेह से होने वाले किडनी डैमेज को रोकने की दिशा में बड़ी उपलब्धि है।

ट्रांसप्लांट मरीजों में सही खुराक से बढ़ी सफलता दर

दूसरे शोध में डॊ. सुश्रत गुप्ता ने किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों को दी जाने वाली ‘टैक्रोलिमस’ इम्यूनोथेरेपी पर फोकस किया। डॉ. गुप्ता ने बताया कि दवा की उचित खुराक तय करने और सीवीपीथ्रीएपी जैसे बायोमार्कर के स्तर की निगरानी से ट्रांसप्लांट की सफलता दर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उच्च खुराक के बावजूद कोई गंभीर दुष्प्रभाव सामने नहीं आए, जिससे दवा की सुरक्षा और प्रभावशीलता दोनों प्रमाणित हुईं।

आईजीए नेफ्रोपैथी: संक्रमण से शुरू होकर गंभीर किडनी रोग तक

तीसरे शोध में डॊ. गुप्ता द्वारा 30 से 40 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों में टॉन्सिल, गले के संक्रमण, पेशाब के संक्रमण और निमोनिया के बाद उत्पन्न किडनी समस्याओं का पर किये गये अध्ययन के बारे में बताया गया। उन्होंने बताया कि इन मरीजों में पेशाब में खून (हिमेचूरिया), प्रोटीन्यूरिया, उच्च रक्तचाप और शरीर में सूजन जैसे लक्षण पाए गए।
बायोप्सी जांच में ‘मेसैन्जियल आईजीए जमाव’ प्रमुख कारण पाया गया, जिससे किडनी की नलिकाओं में सूजन और क्षति होती है। शोध में यह भी स्पष्ट हुआ कि इम्यूनो-सप्रेसिव थेरेपी से रोग की प्रगति को धीमा किया जा सकता है।

भारतीय मरीजों के लिए अलग उपचार प्रोटोकॉल की जरूरत

डॉ. गुप्ता ने अपने निष्कर्ष में कहा कि आईजीए नेफ्रोपैथी के क्लिनिकल और पैथोलॉजिकल पैटर्न पश्चिमी देशों से भिन्न हो सकते हैं, इसलिए भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग और सटीक उपचार प्रोटोकॉल विकसित करना बेहद जरूरी है।

चिकित्सा विरासत से जुड़े हैं डॉ. सुश्रुत

डॉ. सुश्रुत गुप्ता प्रतिष्ठित चिकित्सा परिवार से आते हैं। उनके पिता डॉ. शरद गुप्ता वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ एवं पर्यावरणविद हैं, जबकि माता डॉ. शिखा गुप्ता जानी-मानी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।
डॉ. सुश्रुत पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने शोध प्रस्तुत कर चुके हैं और लगातार भारतीय चिकित्सा विज्ञान को वैश्विक पहचान दिला रहे हैं।

SP_Singh AURGURU Editor