त्योहारों की तिथियों में बढ़ता भ्रम: एक ही आस्था, अलग-अलग दिन- सनातन परंपरा में समन्वय की चुनौती और आधुनिक युग में ‘एक तिथि’ की पुकार

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान- होलिका दहन हो या दुल्हडी, दीपावली हो या हनुमान जयंती, आज के समय में इन तीज-त्योहारों की एकरूपता धीरे-धीरे समाप्त होती दिखाई दे रही है। स्थिति यह बन गई है कि एक ही पर्व अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तिथियों में मनाया जा रहा है। कहीं आज, कहीं कल, और कहीं तो वह पर्व पहले ही संपन्न हो चुका होता है।

Apr 2, 2026 - 13:57
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त्योहारों की तिथियों में बढ़ता भ्रम: एक ही आस्था, अलग-अलग दिन- सनातन परंपरा में समन्वय की चुनौती और आधुनिक युग में ‘एक तिथि’ की पुकार
एक ही आस्था के पर्वों की अलग-अलग तिथियों में बढ़ती प्रवृत्ति सामाजिक एकता के लिए चुनौती बन रही है। आधुनिक तकनीक के साथ समन्वय कर एक मानक तिथि प्रणाली और प्रामाणिक धार्मिक व्याख्याओं की आवश्यकता समय की मांग है।

हाल ही में महावीर जयंती का उदाहरण सामने आया, जब दो दिन पहले स्कूल-कॉलेज इस अवसर पर बंद रहे, जबकि जैन धर्म के एक अन्य वर्ग ने इसे अगले दिन मनाया। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आधुनिक तकनीक और गणना पद्धतियों के बावजूद यह असमानता बढ़ती जा रही है? पहले परंपरागत पंचांग के आधार पर एक ही तिथि सर्वमान्य होती थी, जिसे समाज एक साथ स्वीकार करता था।

दूसरी ओर, अन्य धर्मों में तिथियों की एकरूपता स्पष्ट दिखाई देती है। 25 दिसंबर को ही क्रिसमस मनाया जाता है, जबकि ईस्टर और गुड फ्राइडे भी निश्चित गणना प्रणाली के अनुसार एक ही दिन पूरे विश्व में मनाए जाते हैं। इस्लाम धर्म में भी चांद दिखने की परंपरा के आधार पर ईद मनाई जाती है, जहां एक विश्वसनीय धार्मिक घोषणा पूरे समुदाय को एक सूत्र में बांध देती है।

ऐसे में यह विचार उठना स्वाभाविक है कि क्या अब समय आ गया है कि परंपरागत गणना प्रणाली को आधुनिक तकनीक के साथ समन्वित कर एक मानक तिथि प्रणाली विकसित की जाए? क्या एक ऐसा डिफॉल्ट सिस्टम नहीं होना चाहिए, जो सभी के लिए समान तिथि निर्धारित कर सके? यह केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रश्न भी है।

वर्तमान स्थिति कहीं न कहीं आंतरिक मतभेदों और विभाजन को भी दर्शाती है। यदि एक ही आस्था के लोग अलग-अलग दिनों में अपने पर्व मनाएंगे, तो यह एकता की भावना को कमजोर कर सकता है। एकजुटता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, और उसे बनाए रखना समय की मांग है।

इसके साथ ही एक और चिंता का विषय है। धार्मिक कथाओं और प्रसंगों में बढ़ती नई व्याख्याएं। आजकल कुछ कथाओं में ऐसे प्रसंग जोड़े जा रहे हैं, जिनका मूल ग्रंथों या परंपराओं में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। उदाहरण के तौर पर, यह कहा जाना कि भगवान श्रीराम के यज्ञ को पूर्ण कराने के लिए रावण को बुलाया गया या मेघनाथ के माध्यम से सीता माता को यज्ञ में शामिल किया गया, ऐसे प्रसंग श्रोताओं को भ्रमित कर सकते हैं।

वास्तव में, भगवान राम का जीवन धर्म, मर्यादा और सत्य की स्थापना का प्रतीक है। उन्होंने जिस शिवधनुष को तोड़ा, वह उनकी दिव्यता और शक्ति का प्रमाण था, जिसे रावण जैसा शक्तिशाली राजा भी हिला नहीं सका। भगवान परशुराम ने भी उनके स्वरूप को पहचान लिया था। ऐसे में कथाओं में असंगत तत्व जोड़ना परंपरा की मूल भावना को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता है विवेकपूर्ण दृष्टिकोण की, जहां हम परंपरा का सम्मान करते हुए तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही अपनी आस्था को आगे बढ़ाएं।

SP_Singh AURGURU Editor