स्वप्न में हनुमानजी ने दिया आदेश, रामलला के दर्शन को निकले हनुमान गढ़ी के महंत
अयोध्या। अयोध्या की पवित्र भूमि पर मंगलवार को एक ऐतिहासिक घटना हुई। हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महंत प्रेमदास पहली बार मंदिर परिसर से बाहर निकले। उन्होंने बताया कि उन्हें स्वप्न में स्वयं हनुमानजी ने दर्शन देकर आदेश दिया कि वे रामलला के दर्शन करें। यह स्वप्न एक दिव्य संकेत था, जिसे महंत प्रेमदास ने आस्था की भावना से स्वीकार किया। इस दिव्य अनुभव के बाद उन्होंने अयोध्या के प्रमुख संतों और अखाड़ों की बैठक बुलाई और वहां हनुमानजी के आदेश की बात साझा करते हुए रामलला के दर्शन की इच्छा प्रकट की।
-पौने तीन सौ साल से ज्यादा पुरानी परंपरा टूटी, अखाड़ों की सहमति से पहली बार परिसर से बाहर निकले महंत प्रेमदास
अखाड़ों ने दी परंपरा तोड़ने की अनुमति
हनुमान गढ़ी की लगभग तीन सौ साल पुरानी परंपरा रही है कि वहां का गद्दीनशीन महंत जीवनभर मंदिर परिसर से बाहर नहीं जाते। सेवा, भक्ति और साधना के बीच ही उनका जीवन बीतता है। लेकिन जब महंत प्रेमदास ने अपने दिव्य स्वप्न की बात बताई, तो अखाड़ों ने इसे साधारण घटना नहीं माना। सभी ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि यह परंपरा धर्म और श्रद्धा की भावना के अधीन है और जब स्वयं हनुमानजी की आज्ञा हो, तो उसका पालन सर्वोपरि है। इसके बाद महंत प्रेमदास को रामलला के दर्शन की अनुमति दी गई।
हाथी-घोड़े और जयकारों के बीच भव्य यात्रा
महंत प्रेमदास के राम लला दर्शन यात्रा की शुरुआत हनुमान गढ़ी परिसर से हुई। बैंड-बाजों, हाथियों और घोड़ों की अगुवाई में यह शोभायात्रा निकाली गई। रास्ते भर श्रद्धालु 'जय श्रीराम' और 'जय बजरंगबली' के नारों से वातावरण को गुंजाते रहे। जगह-जगह पुष्पवर्षा की गई। प्रेमदास महाराज सरयू तट पहुंचे, जहां उन्होंने विधिवत स्नान किया और पूजा-अर्चना के बाद रामलला के दर्शन के लिए रवाना हो गए।
तीन सदियों से नहीं टूटी थी यह मर्यादा
हनुमान गढ़ी की यह परंपरा 1737 में मंदिर स्थापना के साथ शुरू हुई थी। सौ साल पहले जब मंदिर का संविधान लिखा गया, तब भी इस परंपरा को विधिवत स्थान दिया गया था। परंपरा के अनुसार, महंत जीवन भर मंदिर से बाहर नहीं निकलते, केवल मृत्यु के बाद उनका पार्थिव शरीर ही परिसर से बाहर लाया जाता है। इतना ही नहीं, 1980 में अदालत के बुलावे पर भी तत्कालीन महंत बाहर नहीं गए थे। तब अदालत को ही मंदिर परिसर में आकर सुनवाई करनी पड़ी थी। प्रेमदास जी का बाहर आना इस लिहाज से एक ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण है।
धर्म, परंपरा और श्रद्धा का अनूठा संगम
महंत प्रेमदास का यह निर्णय केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, यह उस श्रद्धा और संतुलन की मिसाल है जिसमें परंपरा और आस्था एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। एक ओर जहां सदियों पुरानी मर्यादा है, वहीं दूसरी ओर हनुमानजी का आदेश और उनके प्रति अगाध भक्ति भी है। प्रेमदास जी ने संतों की सहमति लेकर यह संदेश दिया है कि धर्म का आधार आत्मा और भाव है, न कि जड़ नियम।
अयोध्या में उमड़ा जनसैलाब, श्रद्धालु हुए भावुक
रामलला के दर्शन के लिए निकले महंत को देखने हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। हर किसी के लिए यह अविस्मरणीय दृश्य था। एक संत, जिसने जीवन सेवा और साधना में समर्पित किया, आज जब प्रभु के दर्शन को निकला, तो हर आंख श्रद्धा और भाव से भीगी हुई थी। अयोध्या ने आज इतिहास को साक्षी बनाकर देखा।