बेर से बैर, और सेब से प्यारः झूठा ताज और अनदेखी विरासत

समाज में महंगे और प्रचारित फलों जैसे सेब को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति इतनी गहरी हो गई है कि सस्ते, पौष्टिक और देसी फल जैसे बेर, काफल, काकू, आड़ू आदि उपेक्षित होते जा रहे हैं। यह न केवल पोषण के नजरिए से अन्याय है, बल्कि ग्रामीण फलों और किसानों के हितों की भी अनदेखी है। प्रचार और भ्रम के चलते सेब को सबसे गुणकारी मान लिया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि बेर और केले जैसे देसी फल अधिक पौष्टिक और सुलभ हैं। आवश्यकता इस बात की है कि समाज पूर्वग्रहों से हटकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए, और देसी फलों को फिर से सम्मान दे।

Jul 15, 2025 - 13:11
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बेर से बैर, और सेब से प्यारः झूठा ताज और अनदेखी विरासत

-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

न जाने कब सेब से प्यार बढ़ा और बेर का तिरस्कार शुरु हुआ। शबरी को श्री राम के आने की खबर पहले से ही थी और उसने चुन-चुन कर कुछ बेर उनके लिए रखे थे, जो श्री राम ने बेहद चाव से ग्रहण किये। हमारा इतिहास बताता है कि तब तलक बेर को कितना सम्मान प्राप्त था।

तथ्य यह है कि सेब न केवल महंगा फल है, बल्कि इसमें पौष्टिक तत्व एक केले या उतने ही वजन के बेर से कम होता है। परन्तु चलन में सेब ही ज्यादा है। भला कैसे किसी के घर मामूली से बेर लेकर जा सकोगे। जमाना क्या कहेगा? घर वाले क्या सोचेंगे और कहेंगे। मजाक न उड़ेगा कि आये तो बेर लेकर आये।

बात बोलने, कहने की और समझने की है। सेब का ही बोलबाला आजकल है। विदेश के अवेकेड़ो, कीवी फ्रूट, ड्रेगन फ्रूट का भी चलन बढ़ रहा है, क्योंकि वे नायाब हैं और महंगे भी। भला बेर का क्या मूल्य इन सब के सामने। बड़े-बड़े शहरों में सेब तो खूब मिलेंगे, पर बेर शायद नहीं। आजकल तो बेर की झाड़ियां या बेर के पेड़ दिखने भी बन्द हो गये होंगे दिल्ली, गुरुग्राम, मुम्बई इत्यादि उत्कृष्ट शहरों में।

समझदार लोग जानते भी होंगे कि सेब (अंग्रेजी में एप्पल) का कब्ज में थोड़ा फायदा देने के अलावा और कोई विशेष महत्व नहीं है। पर एक कहावत जो चल पड़ी, "An apple a day keeps the doctor away", उसने सेब को सबसे शक्तिशाली, पौष्टिक, गुणकारी फल के रूप मे स्थापित कर दिया।

हमारे कृषक जब तक इसका व्यापार स्वयं संभालते थे, तब तक 30 -32 रूपये किलो आसानी से मिलता था। पर जब से बड़े इंडस्ट्री वाले इसके व्यापार में संलग्न हो लिए, तब से पहले तो ज्यादातर सेब उनके गोदाम और कोल्ड स्टोर में चले जाते हैं। सेब के दाम तो फिर सुरसा के मुंह की भांति बढ़ते ही जाने हैं। आजकल तो उनके एक किलो में सेर भर बेर आ सकते हैं।

सेब के प्रचार-प्रसार से समाज को यह पता चल रहा है कि सेब कितने बेहतर हैं सेहत के लिए। इसीलिए ही तो यह कम पड़ रहे हैं और महंगे भी होते जा रहे हैं। पहले जहां सेब की पैदावार होती है, वहां अन्य फल भी होते हैं। पर उनको कोई दो कौड़ी में भी आज खरीदने को तैयार नहीं है। इसीलिए वे फल बाजार में कम ही दिखते हैं। कुछेक तो लुप्तप्रायः ही हो गये।

कोई बतायेगा कि उत्तराखंड मे "काकू" के आज कितने पेड़ बचे हैं? काकू चालीस-पचास साल पहले जंगली पेड़ की तरह पाया जाता था। तीस साल से कम की उम्र के कितने उत्तराखंडी लोग होंगे जिन्होंने काकू चखा होगा या काफल खाये होंगे। वे "फैशन" से बाहर होते गये। और सेब आगे बढ़ता गया। फायदा क्या इंसान की सेहत को वाकई में हुआ सेब से? किसान जो सेब की खेती करते गये, क्या उनको फायदा हुआ? अनुमान तो हमारा यह कहता है कि उनकी लागत भी बामुश्किल निकल पाती होगी। फायदा तो एकतरफा हो गया है उनका, जो सेब के व्यापार से जुड़ते चले गये।

कोई शोध शायद इस विषय पर कभी नहीं हुआ। न कभी डायटरी गुणों का सही आंकलन। बस मान लिया गया जो भी गोरों ने समझाया। ऊपर वाले की इतनी देन रही भारतवर्ष पर कि यहां इतने प्रकार के फल-फूल और खाद्य पदार्थ प्राप्त सुगमता से होते रहे। कभी क्या सरकार ने, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने, इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च या किसी एनजीओ इत्यादि ने कोशिश की कि काकू, आडू, काफल, इत्यादि फलों का महत्व बताया जाए। सेब ही हर जगह छाया रहा, जो गलत है।

क्या किसी ने 'काकू' को दिल्ली, मुम्बई, कोलकता, आगरा, भोपाल, इंदौर, जैसी जगह में कभी देखा या सुना है? पंतनगर कृषि महाविद्यालय, कृषि मंत्रालय, आईसीएआर यदि आज भी शोध करवायें तो पायेंगे कि बेर, काकू, केले की गुणवत्तक तुलना सेब से कहीं ज्यादा है। यदि चाहें तो दूध का दूध, और व्यापारिक रहस्य का आज के आज ही खुलासा हो जायेगा। पर हम हिंदुस्तानी हैं कि अंग्रेजों ने जो बता दिया, वही शाश्वत सत्य है। उसके बाद क्या सोचना और क्या कहना। कुछ तनिक भी बदलने की सोचना एक भारी दोष सा होगा, है ना?

कहने को तो बहुत सारी अवधारणायें प्रचिलित हैं और सभी को समाज की मान्यता भी लगातार मिली हुई है। क्या किसी मॉल मे बेर बिकते किसी ने देखे? उदाहरण के तौर पर, ज्यादातर यही हाल दवाओं का भी है। बेहद सस्ती दवा रखने और बेचने को ज्यादातर लोग तैयार नहीं हैं। यदि यह सत्य न होता तो क्या प्रधानमंत्री के जन औषधि केंद्रों के अलावा कोई और दुकान टिक पाती? दवा वहां भी हैं, परन्तु बेहद सस्ती हैं। लोगों ने लोगों से कई तरह की बातें भी तो सुनी हैं। इसीलिए अधिकतर समझदार और ज्ञानी लोग इन दवा केंद्रों की दवा को बढ़िया दवा नहीं मानते और न सेवन करते या करवाते हैं।

यदि सोच ही समाज के कहने पर आधारित हो, तो बेर, केला, काकू, नासपाती, आड़ू, काफल, इत्यादि, जो सस्ते फल हैं, वो कितना दिखते और बिकते हैं आजकल? और यह भी देखिये कि उनके पेड़ काटकर सेब, अंगूर, आम, इत्यादि महंगे फलोँ के कितने पेड़ लगाये जा रहे हैं।

क्या यह उल्टा फैशन चलते रहना चाहिये? क्या वो फैशन जो बीमार को देखने, या किसी के घर जाते वक्त, सेब लेकर जाना ही उचित और ठीक समझा जाता रहेगा, और कब तक। यह जानते हुए भी कि यदि केला और बेर ज्यादा लेकर जाते तो वे अधिक पौष्टिक रहते और मरीज की सेहत के लिए फायदेबंद होते। सेब से कहीं ज्यादा।

गूगल बाबा सब सच बता ही देगा। परन्तु हाथ कंगन को आरसी क्या। खुद ही आजमा लो। एक मध्यम वर्ग का परिवार जिसमे दो बच्चे हों, वो तीन महीने में अंतर स्वयं जान सकता है। सब जानते ही होंगे कि एक सेब की कीमत के बदले दस बेर या दो से तीन केले आ सकते हैं। परिवार जब जब भी फल खिलाना चाहे, अपने बच्चों को हर दिन, या हर हफ्ते, तो अगले तीन महीनों तक एक बच्चे को सेब ही खिलाये, और दूसरे बच्चे को एक सेब के वजन के बराबर बेर। यदि बेर से कोई एलर्जी न हो, तो बेर ही देते रहें। जब-जब पहले बच्चे को सेब खिलाया जाये, दोनों बच्चों के वजन और लम्बाई भी इस प्रयोग से पहले और तीन महीने के बाद पुनः देखें। चित्त व दिमाग भी देखें। स्वयं फर्क देखें और समाज को भी अपना निष्कर्ष बतायें।

यह भी ध्यान रखें कि बिना सेब खाये ही हमारे ऋषि मुनियों ने वेद पुराण लिख डाले, और समस्त दुनिया को क्या-क्या न दे दिया।
समाज का कुछ भला हो सके, और किवदंतियां मिट सकें, इसीलिए हमने यह सब कुछ लिखा है। कई मेडिकल की डिग्री हैं, जिनमें न्यूट्रिशन में डिप्लोमा भी शामिल है। सोचा कि समय-समय पर अपने तजुर्बे और ज्ञान को समाज के बीच बांट लूं। यदि किसी का और देश का फायदा हो, तो भला। बाकी सब ईश्वर इच्छा।

SP_Singh AURGURU Editor