राणा सांगा मामले में वाद की पोषणीयता पर सुनवाई, अगली सुनवाई 23 मई को
आगरा। आगरा के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) में गुरुवार को राणा सांगा मामले से संबंधित विचाराधीन प्रकीर्ण वाद संख्या 128/2025 -अजय प्रताप सिंह आदि बनाम अखिलेश यादव आदि की पोषणीयता पर सुनवाई हुई। वादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने अदालत में ऐतिहासिक तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और नागरिक अधिकारों का हवाला देते हुए वाद को पोषणीय बताया।
वादी का पक्ष: "राणा सांगा राष्ट्रवाद के प्रतीक"
वादी अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने तर्क दिया कि समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन द्वारा राणा सांगा को 'गद्दार' कहे जाने और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा उनके बयान का समर्थन करने से देश की सांस्कृतिक विरासत को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि बाबरनामा और लाहौर गजेटियर (1883-84) के अनुसार, भारत पर बाबर का आक्रमण राणा सांगा के निमंत्रण पर नहीं, बल्कि पंजाब के तत्कालीन गवर्नर दौलत खान लोदी के आमंत्रण पर हुआ था।
अधिवक्ता सिंह ने कहा कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से राणा सांगा भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद का प्रतीक हैं, जिनका सम्मान करना संविधान के अनुच्छेद 51(क)(च) के अंतर्गत नागरिकों का मूल कर्तव्य है।
संवैधानिक आधार पर बहस
अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने अदालत को बताया कि संसद सरकार का एक अंग है और अखिलेश यादव व रामजीलाल सुमन संसद सदस्य होने के कारण उनके बयान राज्य की परिधि में आते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, मूलवंश के आधार पर विभेद नहीं किया जा सकता। अतः इस बयान से वादी के मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और उन्हें न्यायालय से अनुतोष पाने का अधिकार प्राप्त है।
इतिहास की दृष्टि से भी सवाल उठाए
एडवोकेट अजय प्रताप सिंह ने दावा किया कि बाबर और राणा सांगा के बीच युद्ध 17 मार्च 1527 को सीकरी किले पर हुआ, न कि खानवा में। इस तथ्य को गलत बताकर राणा सांगा की छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है, जो वाद को पोषणीय बनाता है।
अगली सुनवाई की तिथि 23 मई
माननीय न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अगली सुनवाई की तिथि 23 मई 2025 निर्धारित की है।