ताज की चमक के पीछे मरता इतिहास: हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका से खुला सच, आगरा की विरासत पर लापरवाही का काला साया

-बृज खंडेलवाल- आगरा। दुनिया जहां ताजमहल की चमक में डूबी रहती है, वहीं उसी शहर के भीतर इतिहास खामोशी से दम तोड़ रहा है। टूटते गुंबद, मिटती दीवारें और झाड़ियों में दबे आंगन उस सच्चाई की गवाही दे रहे हैं, जिसे व्यवस्था ने सालों से अनदेखा किया। अब इस अनदेखी पर कानूनी चोट करते हुए एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

Mar 25, 2026 - 11:55
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ताज की चमक के पीछे मरता इतिहास: हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका से खुला सच, आगरा की विरासत पर लापरवाही का काला साया

इस गंभीर मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा, झांसी, वृंदावन, लखनऊ और हस्तिनापुर समेत कई शहरों में बिखरती धरोहर पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब तलब किया है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है।

हकीकत यह है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के आगरा सर्किल के जिम्मे 265 संरक्षित स्मारक हैं, लेकिन एक भी स्थल पर हेरिटेज बायलॉज का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा। पिछले 15 वर्षों से फाइलें घूमती रहीं, लेकिन जमीनी स्तर पर संरक्षण ठप पड़ा रहा। और सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह कि सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया, जबकि जमीन पर अवैध निर्माण तेजी से बढ़ते रहे।

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या के अनुसार दारा शिकोह की खोई लाइब्रेरी, फतेहपुर सीकरी की मिटती शैल चित्रकला, बेगम समरू का बगीचा, सुल्तान परवेज का मकबरा, ताल फिरोज खान, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान, जसवंत सिंह की छतरी, चौबुर्जी और बादशाही बाग जैसे अनगिनत स्मारक उपेक्षा की भेंट चढ़ रहे हैं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि इतिहास का सुनियोजित क्षरण है।

जनहित याचिका में सामने आया कि उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक धरोहरें दर्ज हैं, लेकिन संरक्षित सिर्फ 421 हैं। बाकी स्मारक अतिक्रमण, समय और प्रशासनिक उदासीनता के बीच धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। यमुना का प्रदूषण, भूजल का दबाव और बाढ़ जैसी प्राकृतिक चुनौतियां भी इन धरोहरों की नींव को खोखला कर रही हैं।

वृंदावन में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां 48 से अधिक प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की बाट जोह रहे हैं। यमुना किनारे की विरासत अतिक्रमण में दब चुकी है, और नीति-निर्माताओं की नजर से लगभग गायब हो चुकी है।

अब अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पूरी धरोहर सूची तैयार की जाए, हर स्मारक के लिए बायलॉज बनाए जाएं, सख्ती से पालन हो, अलग स्टाफ नियुक्त किया जाए और एक प्रभावी हेरिटेज बोर्ड का गठन किया जाए।

आगरा हर साल 80 लाख से ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन अधिकांश सिर्फ ताजमहल तक सीमित रह जाते हैं। शहर की असली पहचान उसके गुमनाम स्मारक, टूटते दरवाजे और उजड़ते बाग धीरे-धीरे इतिहास के अंधेरे में खोते जा रहे हैं।

यह सिर्फ पत्थरों का संकट नहीं, बल्कि शहर की आत्मा, पहचान और विरासत का सवाल है। हर गिरती दीवार एक कहानी को मिटा रही है, हर अतिक्रमण एक याद को चुरा रहा है। अदालत की घंटी बज चुकी है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार जागते हैं या इतिहास यूं ही खामोशी से दफन होता रहेगा।

SP_Singh AURGURU Editor