खुद को सनातनी कहते हो, तो सनातनी परंपराओं को क्यों भुला बैठे हो?
भारतीय समाज में एक ओर हम सनातन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य परंपराओं जैसे केक और फीता काटने को उत्सवों में प्राथमिकता देने लगे हैं। सनातन संस्कृति जोड़ने की प्रतीक है, जबकि 'काटना' विघटन का संकेत है। खुद को सनातनी मानते हैं तो यह भी जरूरी है कि अपनी परंपराओं को अपनाकर अपने उत्सवों को संस्कारित बनाएं और अगली पीढ़ी को भी यही मूल्य दें।
केक और फीता काटते हो जबकि सनातन तो जोड़ता है
भारतीय संस्कृति में हर शुभारंभ, हर उत्सव, हर नई शुरुआत ‘जोड़ने’ के प्रतीक से होती थी। नारियल फोड़ना, बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना, देवी-देवताओं का स्मरण करके नई राह पर चलना- यही हमारी परंपरा रही है। लेकिन आज जब हम खुद को सनातनी कहने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं, तो हमें यह भी पूछना चाहिए- क्या हम वाकई उस परंपरा को जी रहे हैं?
आज किसी का जन्मदिन हो या कोई उद्घाटन समारोह, पहली चीज़ जो होती है केक काटना या फिर फीता काटना। यह परंपरा अब ‘ट्रेंड’ बन गई है, खासकर वर्ष 2000 के बाद। पहले जन्मदिन वाले दिन बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श और आशीर्वाद से दिन शुरू होता था। घर के बड़े बुजुर्ग पूजा करवाते थे, सीधा (दान) निकलवाते थे और फिर बादाम या सूजी के हलवे से मुंह मीठा कराया जाता था। शाम को पकवान बनते थे। सामर्थ्यवान लोग परिवार के साथ होटल भी जाते थे। ये सनातनी परंपरा थी जो अब विलुप्त हो चुकी है। जन्मदिन का मतलब अब केक, मोमबत्तियां और फोटोशूट तक सीमित हो गया है।
बुजुर्ग एक ओर हो गये, नेता-अधिकारी सेलिब्रिटी आगे आ गईं
इसी प्रकार नये प्रतिष्ठान का शुभारंभ अथवा अन्य किसी कार्यक्रम की शुरुआत बड़े बुजुर्गों के हाथों नारियल फोड़ने के साथ होती थी। श्री गणेश-श्री लक्ष्मी जी का पूजन होता था। नारियल तो अब भी फूटते हैं, पूजन भी होता है लेकिन सबसे ज्यादा अहम हो गया है फीता काटना। फीता काटना सनातनी परंपरा में तो कहीं नहीं है, यह तो विशुद्ध रूप से पाश्चात्य परंपरा है। और हां, इस प्रक्रिया से परिवार के बुजुर्ग गायब हो चुके हैं। उनकी जगह ले ली राजनीतिक नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों या फिर फिल्म कलाकारों जैसी सेलिब्रिटीज ने।
फीता काटना एक प्रतीक है तोड़ने का, अलग करने का
सनातन संस्कृति कहती है- ‘संयोगाय समारम्भः’ यानी शुभ कार्यों का प्रारंभ जोड़ने से होता है। हम जोड़ते हैं- संबंध, भाव, परंपरा और आस्था। फिर हम ऐसे रिबन कटिंग जैसे प्रतीकों को क्यों अपना रहे हैं जो जोड़ने के नहीं, काटने और विभाजन के प्रतीक हैं?
बदलाव की शुरुआत घर से होती है।
यदि एक परिवार यह संकल्प ले कि वह अब जन्मदिन पर केक नहीं काटेगा, बल्कि हलवा, पंचामृत या परंपरागत मिष्ठान्न से शुभारंभ करेगा, तो यह लहर बन सकती है। यदि एक संस्था उद्घाटन के समय फीता नहीं, बल्कि नारियल फोड़कर, कलश पूजन से शुरुआत करे, तो यह आदर्श बन सकता है।
हम बदलते समय के साथ चल सकते हैं, पर अपनी जड़ों को काटकर नहीं।
सांस्कृतिक चेतना के इस दौर में जब हम सनातन पुनर्जागरण की बात कर रहे हैं, तो हमें अपनी हर गतिविधि को भी उसी भाव में देखना होगा। कौन आशीर्वाद देगा- बुजुर्गों की जगह वीआईपी, अभिनेता, नेता? यह सोचने का समय है।
हमारे संस्कारों की नींव ‘काटने’ पर नहीं, ‘जोड़ने’ पर टिकी है, तो क्यों न हम फिर से वही परंपरा जीवित करें जिसमें उत्सव भी हो, उल्लास भी हो, और आस्था की मिठास भी?
-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से
लोक स्वर, आगरा।