पश्चिम के पीछे दौड़कर अपनी जड़ों से कटता भारत: ब्रजधरा साहित्य उत्सव में पद्मश्री बलवंत ठाकुर का सांस्कृतिक आत्मचिंतन, आगरा से विरासत-बोध जगाने का आह्वान
आगरा। हम अपनी ही सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं और पश्चिमी विरासत पर अनावश्यक गर्व कर रहे हैं। हमारी सबसे बड़ी विफलता यह रही कि हमने अपने सांस्कृतिक वैभव को न तो पहचाना और न ही दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। यह कहना था मशहूर रंगकर्मी और पद्मश्री से सम्मानित बलवंत ठाकुर का, जो अटल उद्यान में आयोजित दो दिवसीय ‘ब्रजधरा साहित्य उत्सव’ के भव्य समापन समारोह में अध्यक्षीय संबोधन दे रहे थे।

पदमश्री बलवंत ठाकुर को सम्मानित करते कार्यक्रम आयोजक।
उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां हर चौराहा इतिहास और संस्कृति से बोलता है, वहां गंभीर बौद्धिक विमर्श होना अपने आप में आशा का संकेत है। उन्होंने कहा कि मैंने विदेशों में साहित्य और रंगमंच के प्रति लोगों की गहरी संवेदनशीलता देखी है, लेकिन अपने देश में हम अपने ही रचनाकारों को वह सम्मान नहीं दे पाते, जिसके वे अधिकारी हैं।
पद्मश्री बलवंत ठाकुर ने एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि लंदन में एक मित्र उन्हें शेक्सपियर का ‘मैकबेथ’ दिखाने ले गया और इस बात को लेकर बेहद उत्साहित था कि वह एक भारतीय रंगकर्मी को अंग्रेज़ी साहित्य का श्रेष्ठ नाटक दिखा रहा है। जब मैंने उसे नाट्यशास्त्र, कालिदास और मोहन राकेश के नाटकों के बारे में बताया, तो उसका भ्रम टूटा। उन्होंने कहा कि पश्चिम को अपनी साहित्यिक परंपरा पर गर्व है, लेकिन हम खुद अपनी जड़ों से अनजान बने हुए हैं।
बच्चों के रंगमंच पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि हम बच्चों के नाटक की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन वास्तव में उनके लिए मौलिक लेखन नहीं करते। इसी सोच के तहत उन्होंने नई नाट्य भाषा पर काम किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके चर्चित नाटक ‘मेरे हिस्से की धूप कहां है’ और ‘आप हमारे हैं कौन’ सामने आए। उन्होंने आगरा में अपना नाटक मंचित करने की इच्छा भी जाहिर की।
कविता, विचार और संवेदना का संगम बना ब्रजधरा साहित्य उत्सव
ब्रजधरा साहित्य उत्सव के समापन अवसर पर काव्य-पाठ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। वरिष्ठ कवि अशोक रावत ने कहा कि साहित्य किसी भी भाषा का हो, वह मानवीय मूल्यों की रक्षा करता है। उनकी पंक्तियां-
कभी वो राह में बिखरे हुए पत्थर नहीं गिनते,
सफर का शौक है, वो किलोमीटर नहीं गिनते…
पर श्रोता देर तक तालियाँ बजाते रहे।
रामेंद्र मोहन त्रिपाठी ने सुनाया-
“पहाड़ फाड़कर बनती हैं नदियां,
नदियां समंदर को प्यार करती हैं...
वहीं डॉ. त्रिमोहन तरल की रचनाएं सामाजिक यथार्थ और संघर्ष की तीखी अभिव्यक्ति बनकर सामने आईं।
नारी लेखन, साहित्य-सिनेमा और स्वास्थ्य पर गंभीर विमर्श
उत्सव के द्वितीय दिवस में विभिन्न बौद्धिक सत्रों का आयोजन हुआ।
चतुर्थ सत्र ‘नारी लेखन : अनुभव से अभिव्यक्ति तक’ की संयोजक डॉ. मधु भारद्वाज रहीं। सत्र में डॉ. सुषमा सिंह, राशि गर्ग और डॉ. शशि गुप्ता ने विचार रखे। डॉ. सुषमा सिंह ने दलित महिला लेखन को संघर्ष और प्रतिरोध की सशक्त आवाज़ बताया, जहां कविता शोषण के विरुद्ध हथियार बनती है।
पंचम सत्र ‘साहित्य, रंगमंच और सिनेमा’ का संयोजन डॉ. महेश धाकड़ ने किया, जिसमें अनिल शुक्ल, सुरेंद्र साथी, दिलीप रघुवंशी और ऋतुराज त्रिपाठी ने संवाद किया।
षष्ठम सत्र में 'साहित्य और स्वास्थ्य का अंतर्संबंध' रहा। संयोजक कुमार ललित थे। डॉ. नवीन गुप्ता, डॉ. अशोक विज, डॉ. मुनीश्वर गुप्ता बतौर वक्ता शामिल रहे। सप्तम सत्र 'साहित्य संस्कृति में शैक्षिक संस्थानों का योगदान' विषय पर हुआ। संयोजक डॉ. शांतनु साहू थे। प्रो. जय सिंह नीरद, डॉ. गिरधर शर्मा बतौर वक्ता शामिल हुए। प्रो. जय सिंह नीरद ने कहा कि पहले मशीन ने मनुष्य को मशीन बनाया, संवेदनाएं पथरा गईं, अब मशीन मनुष्य को पदस्थ करने की कोशिश कर रही हैं।
संगीत, सम्मान और चित्रकला ने रचा उत्सव का रंग
समारोह में गति सिंह और अक्षय प्रताप सिंह और साथियों धैर्य अग्रवाल, अभिषेक शर्मा ने अपनी संगीतमय प्रस्तुति में हनुमान चालीसा की रॉक बैंड पर प्रस्तुति दी। धरा चेतना फाउंडेशन की अध्यक्ष दीपाली सिंह, सचिव अक्षय प्रताप सिंह, कोषाध्यक्ष बरखा सिंह, समन्वयक डॉ. महेश धाकड़, कुमार ललित, कार्यक्रम प्रभारी गति सिंह, पूनम सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया।
समारोह में गौरव दीक्षित, कृतिका कोरंगा, अमीर अहमद, वत्सला प्रभाकर, नंद नंदन गर्ग, डॉ. अभिलाषा, अनिल शर्मा, पार्थों सेन, नरेश तन्हा, भूमिका तिवारी, संजय गोयल, अमित सूरी, कपिल सिंघल और इस्लाम कादरी आदि मौजूद थे।
षष्ठम सत्र ‘साहित्य और स्वास्थ्य’ पर केंद्रित रहा, जबकि सप्तम सत्र में शैक्षिक संस्थानों की सांस्कृतिक भूमिका पर विमर्श हुआ।
ब्रज धरा साहित्य उत्सव में विभूतियों का किया गया सम्मान
'ब्रज धरा साहित्य उत्सव' में सम्मान समारोह में साहित्य, संस्कृति और समाज के लिए उल्लेखनीय योगदान देने वाली शख्शियतों का सम्मान किया गया। शख्सियतों को मशहूर रंगकर्मी पद्मश्री बलवंत ठाकुर द्वारा शॉल, पटका पहनाकर और सम्मान पत्र प्रदान करके सम्मानित किया गया। मशहूर गीतकार सोम ठाकुर को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड घोषित किया गया, जिसको संस्था के पदाधिकारी उनके स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने के कारण, उनके निवास पर जाकर प्रदान करेंगे।
बाकी 11 अन्य सभी साहित्य सेवियों को मंच पर सम्मानित किया गया। 'गीत गौरव सम्मान' रामेंद्र मोहन त्रिपाठी, 'ग़ज़ल गरिमा सम्मान' अशोक रावत, डॉ. त्रिमोहन तरल, सुधीर नारायण, 'साहित्य साधक सम्मान' शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ, 'साहित्य गौरव सम्मान' प्रो. जय सिंह नीरद, योगेश चंद्र शर्मा योगी, 'साहित्य गरिमा सम्मान' डॉ. कुसुम चतुर्वेदी, डॉ. ज्योत्सना शर्मा, 'साहित्य सेवा सम्मान' आचार्य नीरज शास्त्री, रेनु अंशुल को प्रदान किया गया। वहीं गायक सुधीर नारायण के अपने देश से बाहर होने के कारण, उनका सम्मान उनकी धर्मपत्नी पिंकी नारायण ने ग्रहण किया। संचालन कुमार ललित ने किया, धन्यवाद अक्षय प्रताप ने दिया।
ब्रज विषय पर लाइव पेंटिंग से बिखेरे रंग, लगाई चित्र प्रदर्शनी
आगरा। इस मौके पर चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसकी संयोजक डॉ. आभा सिंह गुप्ता, डॉ. मनोज कुमार और डॉ. एकता श्रीवास्तव थीं। कार्यशाला में प्रो. बिंदु अवस्थी, डॉक्टर सविता प्रसाद, प्रो. नीलम कांत, डॉ. रश्मि सक्सेना, रश्मि सिंह, अरविंद, डॉ. शीतल, डॉ. दिनेश मौर्य, सुनील शामिल थे। कलाकारों द्वारा ब्रज विषय पर बनाए गए आकर्षक चित्रों की एक भव्य प्रदर्शनी लगाई गई थी। जिसे कला प्रेमियों ने सराहा।