17 जुलाई को पटरी पर दौड़ेगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, रचेगी नया इतिहास

भारत 17 जुलाई को रेलवे के इतिहास में नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से संचालित ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। जींद–सोनीपत रेलखंड पर चलने वाली यह ट्रेन पर्यावरण के अनुकूल, लगभग शून्य प्रदूषण वाली और ब्रॉड गेज पर दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल होगी। इसके संचालन के लिए जींद में अत्याधुनिक हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग स्टेशन भी तैयार किया गया है।

Jul 7, 2026 - 17:21
 0
17 जुलाई को पटरी पर दौड़ेगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, रचेगी नया इतिहास

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी ) की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से संचालित ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। यह ट्रेन हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड पर संचालित होगी और इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने रेलवे में हाइड्रोजन तकनीक का उपयोग शुरू कर दिया है। सरकार का दावा है कि इस ट्रेन के संचालन से लगभग शून्य प्रदूषण होगा और यह भविष्य की स्वच्छ परिवहन व्यवस्था की मजबूत नींव साबित होगी।

क्या होती है हाइड्रोजन ट्रेन?

हाइड्रोजन ट्रेन ऐसी रेलगाड़ी होती है जो डीजल या पारंपरिक बिजली की बजाय हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से संचालित होती है। इस तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न की जाती है, जिससे ट्रेन का इंजन चलता है। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप केवल जलवाष्प और ऊष्मा निकलती है, जिससे यह तकनीक पर्यावरण के लिए बेहद सुरक्षित मानी जाती है।

डीजल और बिजली से कितनी बेहतर है हाइड्रोजन तकनीक?

डीजल इंजन जीवाश्म ईंधन पर आधारित होते हैं और इनके संचालन से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक गैसें निकलती हैं। यही गैसें ग्लोबल वॉर्मिंग और वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण बनती हैं। भारत में अधिकांश रेल मार्गों का विद्युतीकरण हो चुका है और इलेक्ट्रिक ट्रेनें अपेक्षाकृत कम प्रदूषण करती हैं। हालांकि, वर्तमान में देश की बड़ी मात्रा में बिजली अभी भी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से तैयार होती है। इसलिए इलेक्ट्रिक ट्रेनें सीधे प्रदूषण नहीं फैलातीं, लेकिन उनकी ऊर्जा का स्रोत अभी पूरी तरह स्वच्छ नहीं माना जाता।

ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेनें एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आती हैं क्योंकि इनके संचालन के दौरान कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। यदि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन का व्यापक उपयोग होता है, तो रेलवे का कार्बन फुटप्रिंट और भी कम किया जा सकेगा।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की खासियतें

यह ब्रॉड गेज पर चलने वाली दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक होगी। ट्रेन में कुल 10 कोच होंगे। इसमें दो ड्राइविंग पावर कार और आठ यात्री कोच शामिल किए गए हैं। ट्रेन की कुल क्षमता 2400 किलोवाट होगी। प्रत्येक ड्राइविंग पावर कार की क्षमता 1200 किलोवाट होगी। आधुनिक सुरक्षा और ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली से लैस यह ट्रेन लंबी दूरी के संचालन के लिए तैयार की गई है।

जींद में तैयार हुआ हाईटेक हाइड्रोजन स्टेशन

इस ट्रेन के संचालन के लिए हरियाणा के जींद में विशेष हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सुविधा विकसित की गई है। यहां उच्च दबाव पर कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित रखा जाएगा और जरूरत पड़ने पर ट्रेन में भरा जाएगा। पूरी प्रणाली को सुरक्षित और निर्बाध संचालन के लिए आधुनिक तकनीक से लैस किया गया है।

रिफ्यूलिंग स्टेशन पर अत्याधुनिक हाइड्रोजन कंप्रेशन सिस्टम स्थापित किया गया है। इसके साथ आवश्यक तकनीकी सहायता, महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स और सुरक्षा उपकरण भी उपलब्ध कराए गए हैं। किसी तकनीकी खराबी की स्थिति में संचालन प्रभावित न हो, इसके लिए स्टैंडबाय कंप्रेसर यूनिट की भी व्यवस्था की गई है।

ग्रीन रेलवे की दिशा में बड़ा कदम

भारतीय रेलवे का लक्ष्य भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन को बढ़ावा देना है। हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। इससे न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, बल्कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के उपयोग को भी प्रोत्साहन मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में देश के अन्य गैर-विद्युतीकृत रेल मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन शुरू किया जा सकता है। इससे भारत के रेलवे नेटवर्क को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।