भारत की मेडिकल शिक्षा संकट में: आतंक, व्यापार और कमजोर तालीम का तिहरा खतरा

भारत की मेडिकल शिक्षा बेहद महंगी फीस, सीटों की कमी, विदेशी कॉलेजों की कमजोर पढ़ाई और कुछ मामलों में डॉक्टरों के कट्टरपंथी रास्ते पर जाने जैसी समस्याओं से गहरे संकट में है। इस हालात से निकलने के लिए सरकारी मेडिकल सीटें बढ़ाने, प्राइवेट कॉलेजों में पारदर्शिता लाने, विदेशी डिग्री मान्यता सुधारने और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की तत्काल जरूरत है।

Nov 26, 2025 - 13:56
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भारत की मेडिकल शिक्षा संकट में: आतंक, व्यापार और कमजोर तालीम का तिहरा खतरा

-बृज खंडेलवाल-

स्थेस्कोप की जगह बम हाथ में लिए हिपोक्रेटीज की शपथ लेने वाला डॉक्टर अगर हॉस्पिटल चलायेगा तो समाज किस दिशा में जा रहा है, ये अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है।

क्यों हमारे समाज के मरहम लगाने वाले लोग, यानी डॉक्टर, आतंकवाद के सौदागर बन रहे हैं? और क्यों डॉक्टर बनने का पेशा, जो कभी सेवा और इंसानियत की निशानी था, अब धीरे-धीरे एक पैसा कमाने वाला धंधा बनता जा रहा है? हाल की ख़बरों में जब कुछ डॉक्टरों के आतंकवादी गुुटों से जुड़े होने की बातें सामने आईं, तो यह सवाल और पेचीदा हो गए।

कभी भारत की मेडिकल पढ़ाई हुनर और सेवा का गर्व मानी जाती थी। लेकिन आज हालात उलटे दिख रहे हैं। जिन हाथों को ज़िंदगी बचाने की तालीम दी गई, वही हाथ कुछ जगहों पर ग़लत रास्तों की तरफ़ बढ़ चुके  हैं। जाँच से पता चला कि कई युवा डॉक्टर—ख़ासकर कश्मीर के—भारत के मेडिकल कॉलेजों में नहीं, बल्कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के ढीली निगरानी वाले कॉलेजों में पढ़े। जहाँ पढ़ाई को सही दिशा देने वाली व्यवस्था बहुत कमज़ोर है।

दिल्ली में नीतियाँ बनाने वालों के लिए यह सब चौंकाने वाला है। इससे मेडिकल शिक्षा की कई कमियाँ खुलकर सामने आईं—बहुत महँगी फीस, सीटों की भारी कमी, एडमिशन का जबर्दस्त दबाव, और मजबूरी में विदेश जाकर सस्ती लेकिन कमज़ोर मेडिकल डिग्री लेना। जब क्लीनिकल नॉलेज और प्रोफ़ेशनल हुनर ग़लत सोच वाले लोगों के हाथ में चला जाए, तो पूरा देश ख़तरे में आ जाता है।

भारत में आज लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना देख रहे हैं, मगर हक़ीक़त बहुत सख्त है। हर साल 20 लाख से ज़्यादा NEET देने वालों के लिए सिर्फ़ लगभग सवा लाख के करीब MBBS सीटें हैं। सरकारी कॉलेजों में सीटें कम, मुकाबला बहुत तगड़ा, और प्राइवेट कॉलेजों की फीस 50 लाख से 1 करोड़ तक—जिससे सामान्य परिवार पीछे रह जाते हैं। मजबूरी में हज़ारों छात्र हर साल बांग्लादेश, रूस, फ़िलिपींस और यूरोप के कॉलेजों में चले जाते हैं।

लेकिन विदेशी मेडिकल पढ़ाई में भी दिक्कतें कम नहीं। कुछ कॉलेज ठीक हैं, पर कई जगह अस्पतालों की हालत खराब, स्टाफ़ कम, और पढ़ाई भारतीय मानकों से मेल नहीं खाती। वापस आने पर छात्रों को FMGE पास करना होता है—2025 में इसका पास रेट सिर्फ़ लगभग 18% रहा। यह उनकी काबिलियत नहीं, बल्कि कोर्स की असमानता दिखाता है। इसके बाद इंटर्नशिप और सरकारी औपचारिकताओं की परेशानियाँ अलग।

डॉक्टरों की कमी भी लगातार बढ़ रही है। जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर, राजस्थान और यूपी के कई इलाकों में डॉक्टरों की कमी 40% से ज़्यादा है। ग्रामीण अस्पतालों की हालत और भी ख़राब है। WHO के मानकों से हम बहुत पीछे हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि विदेशी पढ़े डॉक्टर अच्छे हैं या नहीं, बल्कि यह कि देश उनकी क्षमता को कैसे ठीक से इस्तेमाल करे।

इधर मेडिकल एजुकेशन में बढ़ता बेफ़िक्र कारोबार भी नैतिकता को चोट पहुँचा रहा है। महँगे प्राइवेट कॉलेज दो अलग-अलग दुनिया बना रहे हैं—एक अमीरों के लिए, और दूसरी मजबूरी में विदेश जाने वालों के लिए। फीस का सिस्टम पारदर्शी नहीं है, और कई कॉलेज अस्पताल चलाकर पैसा कमाने में लगे रहते हैं, जिससे पढ़ाई की क्वालिटी गिरती है। माता–पिता और छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

इस पूरे संकट से निकलने के लिए एक मज़बूत और साफ़ योजना चाहिए—सरकारी मेडिकल कॉलेज बढ़ाना, विदेशी डिग्रियों की मान्यता को आसान और एकरूप बनाना, FMGE में सुधार करना, इंटर्नशिप सिस्टम को मजबूत करना, और प्राइवेट कॉलेजों में फीस–नियंत्रण व पारदर्शिता लाना। साथ ही शहर–गाँव के स्वास्थ्य ढाँचे का अंतर भी कम करना होगा।

अगर हमने अब कदम नहीं उठाए, तो हालात और बिगड़ेंगे—छात्र विदेश जाते रहेंगे, और देश के करोड़ों लोग डॉक्टरों की कमी से परेशान होते रहेंगे। डॉक्टर बनने का रास्ता इंसाफ़, मेहनत और हुनर पर टिका होना चाहिए—न कि पैसे, किस्मत या ज़बरदस्ती के हालात पर।

सच में,  आतंकवाद, बेहिसाब कारोबार और कमज़ोर तालीम मिलकर भारत की मेडिकल एजुकेशन को एक गंभीर संकट में धकेल रहे हैं। ज़रूरत है ऐसी व्यवस्था की जो इस पेशे की असली रूह—इंसानियत और सेवा—को फिर से जिंदा करे और उसे भटकने से बचाए। गनीमत ये है कि अधिकांश पुरानी पीढ़ी के भारतीय डॉक्टर्स, देश विदेश में अपनी मेहनत, ईमानदारी, काबिलियत से देश और समाज का नाम रोशन कर रहे हैं। मगर कुछ नेगेटिव ट्रेंड्स, अब चिंता का विषय बन रहे हैं।

SP_Singh AURGURU Editor