इंटरनेशनल किसिंग डे छह जुलाई: अनुभूति, अध्यात्म और संस्कृति के संगम का अव्यक्त सत्य
चुंबन केवल पश्चिमी संस्कृति का प्रतीक नहीं बल्कि यह भारतीय प्रेम-दर्शन और अध्यात्म में भी गहराई से समाहित है। चुंबन शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा तक पहुंचने वाली एक सूक्ष्म अनुभूति है, जिसे कालिदास से लेकर ओशो तक ने विभिन्न रूपों में व्यक्त किया। समाज ने प्रेम और स्पर्श जैसे स्वाभाविक अनुभवों को वर्जनाओं में बांध दिया है, जबकि इन्हें संस्कृति, साहित्य और शिक्षा में स्थान मिलना चाहिए।
-डॊ. कौशल नारायण शर्मा-
चुंबन केवल एक पश्चिमी सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म और प्रेम-दर्शन में भी गहरे अर्थ रखता है। यह वह भाव है, जिसे हजारों वर्षों से हम अनुभव तो करते आए हैं, परंतु जिसे शब्दों में समेटने का साहस कम ही लोगों ने किया।
यह कोई साधारण क्रिया नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा तीनों के मिलन का एक सूक्ष्म क्षण है, जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में महाकवि कालिदास ने इसको प्रेम और यौवन की अनुभूतियों के माध्यम से पौराणिक युग में बखूबी दर्शाया। लेकिन समय के साथ समाज ने इन अनुभवों को वर्जनाओं के पर्दे में छिपा दिया। वह भी तब जब वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में इसे ज्ञान और सौंदर्य के स्तर पर परिभाषित किया था।
प्रेम में चुंबन एक ऐसी भाषा है, जो शब्दों की ज़रूरत नहीं रखती। ओशो का मानना था कि भारत की चेतन परंपरा में केवल कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक और कबीर जैसे संत ही इस आत्मिक ऊर्जा को शब्दों में रूपांतरित कर पाए। मगर यह भी सत्य है कि असंख्य संतों, मनीषियों, योगियों और प्रेमियों ने इसे अनुभव अवश्य किया होगा, पर समाज की नैतिक मर्यादाओं के कारण इस पर मौन साधना पड़ा।
चुंबन एक अनुभूति है। स्पर्श से आत्मा तक की यात्रा का साधन। यह केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी देता है। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि स्पर्श और चुंबन से ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन निकलते हैं, जो मानसिक शांति, सुरक्षा और जुड़ाव की भावना को बढ़ाते हैं।
तो प्रश्न यह है कि क्या प्रेम की इन उच्चतर अनुभूतियों को व्याख्यायित नहीं किया जा सकता? निश्चित ही किया जा सकता है, लेकिन सामाजिक वर्जनाओं और शिक्षण पाठ्यक्रमों में इसकी अनुपस्थिति ने इसे अव्यक्त, अनकहा और अस्पर्शनीय बना दिया।
अब समय है कि प्रेम, स्पर्श और आत्मीयता जैसे विषयों को केवल अनुभव तक सीमित न रखा जाए, बल्कि संस्कृति, साहित्य और शिक्षा में इनके वास्तविक और गरिमामय स्थान को स्वीकारा जाए।
(लेखक आगरा क्लब के सचिव हैं)Bottom of Form