वेटलैंड दिवस पर आत्ममंथन कीजिएः प्रकृति और मानव आवश्यकताओं के बीच संतुलन जरूरी है
आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड केवल पक्षियों की चहचहाट, हरियाली और प्राकृतिक दृश्य भर नहीं हैं, बल्कि वे जल, जीवन और भविष्य की सुरक्षा का आधार हैं। विश्व वेटलैंड दिवस के अवसर पर यह प्रश्न और भी गंभीर हो उठता है कि क्या हम सचमुच संरक्षण की दिशा में बढ़ रहे हैं, या केवल दिखावटी विकास के नाम पर अपनी जल-संपदा को धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं?
आर्द्रभूमि का मूल उद्देश्य उनके संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना है। झीलें, तालाब, पोखर और दलदली क्षेत्र न केवल पक्षियों और जैव विविधता के लिए जरूरी हैं, बल्कि मनुष्य के जीवन के लिए सबसे अनिवार्य तत्व पानी के प्राकृतिक भंडार भी हैं। संतुलित विकास तभी संभव है, जब प्रकृति और मानव आवश्यकताओं के बीच संतुलन बना रहे।
आगरा मंडल की स्थिति इस दृष्टि से बेहद चिंताजनक है। एक ओर वेटलैंड को प्रोत्साहित करने के नाम पर कई प्राकृतिक जलस्रोतों को पर्यटन या सौंदर्यीकरण की परियोजनाओं में बदला जा रहा है, दूसरी ओर पूरा मंडल शुद्ध और पर्याप्त पानी के लिए संघर्ष कर रहा है। गंगाजल की योजनाओं के बावजूद आगरा आज भी गुणवत्तापूर्ण पानी को लेकर आशंकित है, यमुना कई स्थानों पर लगभग सूखी पड़ी है। ऐसे में जल-संरक्षण के बजाय केवल सजावटी विकास पर जोर देना वाटर फर्स्ट की मूल भावना के विपरीत है।
जोधपुर झाल, सूर सरोवर पक्षी विहार, पटना पक्षी विहार, चंबल क्षेत्र जैसे स्थल केवल उदाहरण हैं। यदि पूरे मंडल का गहन अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होगा कि हम अपने प्राचीन और प्राकृतिक जलस्रोतों को सहेजने के बजाय किसी न किसी रूप में उन्हें क्षति पहुंचा रहे हैं। जबकि सच यह है कि इनके संरक्षण के लिए भारी-भरकम बजट की नहीं, बल्कि दूरदर्शी योजना, मजबूत इच्छा शक्ति और दूरदृष्टि के दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि कंक्रीट की इमारतें, चौड़ी सड़कें और तात्कालिक आर्थिक लाभ जीवन से ऊपर नहीं हो सकते। पानी, हवा और सूर्य, ये तीनों जीवन की मूलभूत शर्तें हैं। यदि इनमें से कोई भी दूषित या अपर्याप्त हो जाए, तो उस क्षेत्र में रहना न केवल कठिन हो जाता है, बल्कि लोग मजबूरन पलायन करने लगते हैं। यही कारण है कि दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ शहर की चर्चा में वेटलैंड का संरक्षण केंद्रीय विषय होना चाहिए।
जब किसी क्षेत्र को वेटलैंड घोषित किया जाता है, तो उसके साथ इको-सेंसिटिव जोन और बफर जोन का निर्धारण अनिवार्य होता है। साथ ही यह भी तय करना होता है कि उसका क्षेत्रफल कितना हो, ताकि वह पक्षियों और जैव विविधता के लिए वास्तव में उपयोगी साबित हो सके। प्रश्न यह है कि आगरा में घोषित वेटलैंड क्षेत्रों में कहां-कहां बफर जोन और इको-सेंसिटिव जोन स्पष्ट रूप से चिन्हित किए गए हैं? क्या उनकी निगरानी और सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था है? यह पारिस्थितिकीय जिम्मेदारी या केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
विश्व वेटलैंड दिवस पर हम सभी को यह गंभीर चिंतन करना होगा कि आगरा मंडल ही नहीं, बल्कि हर शहर की वास्तविक आवश्यकता क्या है। क्या केवल आर्थिक लाभ और बाहरी सुंदरता हमारे लिए पर्याप्त हैं, या ऐसा विकास चाहिए जो वहां के निवासियों के जीवन को सुरक्षित, स्वस्थ और टिकाऊ बनाए? जवाब स्पष्ट है- प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्चा विकास है।

— राजीव गुप्ता- जनस्नेही कलम से
लोक स्वर, आगरा।
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