अंतरिक्ष में इसरो पलटने जा रहा बाजी, सस्ते लान्च से मार्केट पर दबदबा
‘बाहुबली’ कहे जाने वाले इंडियन सैटेलाइट की सफलता के साथ ही ग्लोबल कमर्शियल लॉन्च मार्केट में लागत को लेकर बहस तेज हो गई है कि इसरो और एलन मस्क की स्पेसएक्स में कौन किफायती है?
नई दिल्ली। इसरो के सबसे ताकतवर रॉकेट एलवीएम-3 ने बुधवार 24 दिसंबर की सुबह श्रीहरिकोटा से सफल उड़ान भरी और 6,100 किलोग्राम वजनी अमेरिकी कम्युनिकेशन सैटेलाइट ‘ब्लू बर्ड’ को कक्षा में स्थापित किया। ‘बाहुबली’ कहे जाने वाले इस सैटेलाइट की सफलता के साथ ही एक बार फिर वैश्विक कमर्शियल लॉन्च मार्केट में लागत को लेकर बहस तेज हो गई है कि इसरो और एलन मस्क की स्पेसएक्स में कौन किफायती है?
एक तरफ इसरो है, जो कम लागत और ‘जुगाड़’ आधारित इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर स्पेसएक्स है, जिसने रीयूजेबल रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष उड़ानों की अर्थव्यवस्था ही बदल दी है। दोनों अब तेजी से बढ़ते कमर्शियल लॉन्च बाजार में आमने-सामने हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट की एक लॉन्च की लागत करीब 6.7 करोड़ डॉलर यानी लगभग 550–560 करोड़ रुपये है। वहीं इसरो के एलवीएम-3 की एक लॉन्च पर अनुमानित खर्च 400–450 करोड़ रुपये बताया जाता है। सीधे तौर पर देखें तो लागत के मामले में इसरो आगे दिखता है।
लेकिन अंतरिक्ष कारोबार में असली पैमाना होता है ‘कॉस्ट पर किलोग्राम’, यानी प्रति किलो पेलोड को कक्षा में पहुंचाने की कीमत। यहीं पर क्षमता का फर्क सामने आता है। एलवीएम-3 लो अर्थ ऑर्बिट में करीब 8–10 टन तक पेलोड ले जा सकता है, जबकि फाल्कन-9 की क्षमता लगभग 22.8 टन है। इस वजह से भले ही फाल्कन-9 की कुल लॉन्च लागत ज्यादा हो, लेकिन प्रति किलो लागत कम पड़ती है। इंडस्ट्री के अनुमान के अनुसार फाल्कन-9 की प्रति किलो लागत 2,700–3,000 डॉलर के आसपास है, जिससे कीमत के मामले में स्पेसएक्स फिलहाल आगे है।
इस अंतर की सबसे बड़ी वजह रीयूजेबिलिटी है। स्पेसएक्स अपने रॉकेट बूस्टर को वापस उतारकर दोबारा इस्तेमाल करता है, जिससे लागत काफी घट जाती है। वहीं एलवीएम-3 अभी पूरी तरह एक्सपेंडेबल है, यानी हर लॉन्च के बाद रॉकेट इस्तेमाल के लायक नहीं रहता। हालांकि इसरो इस मोर्चे पर भी तेजी से काम कर रहा है। रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) और नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) पर काम जारी है। भविष्य में ‘सूर्य’ नाम के एक रीयूजेबल रॉकेट की भी योजना है। अगर भारत बूस्टर रिकवरी और रीयूज तकनीक में महारत हासिल कर लेता है, तो लागत का समीकरण बदल सकता है।
इसके बावजूद, स्पेसएक्स के मुकाबले थोड़ी ज्यादा प्रति किलो लागत होने के बाद भी कई अंतरराष्ट्रीय ग्राहक इसरो को चुन रहे हैं। इसकी बड़ी वजह एलवीएम-3 का 100% सक्सेस रेट है। साथ ही स्पेसएक्स की बुकिंग पहले से भरी होने के कारण समय पर लॉन्च स्लॉट मिलना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में कंपनियां इसरो की ओर रुख कर रही हैं।
इसके अलावा, रणनीतिक कारण भी अहम हैं। कई देश और कंपनियां किसी एक बड़े लॉन्च प्रदाता पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं और भारत को एक भरोसेमंद विकल्प मान रही हैं। जहां स्पेसएक्स अक्सर ‘राइडशेयर’ यानी बस की तरह कई सैटेलाइट एक साथ ले जाता है, वहीं इसरो जरूरत के मुताबिक ‘डेडिकेटेड लॉन्च’ यानी टैक्सी जैसी सेवा भी देता है। भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र भी तेजी से उभर रहा है। स्काईरूट और अग्निकुल जैसे स्टार्टअप छोटे सैटेलाइट के लिए कम लागत वाले रॉकेट विकसित कर रहे हैं, जिससे भारत की मौजूदगी वैश्विक कमर्शियल लॉन्च बाजार में और मजबूत हो रही है।