धन और परिधान नहीं, स्वभाव से बनते हैं महात्मा’: श्रीमद्भागवत कथा में गूंजे अध्यात्म के स्वर
आगरा के बोदला क्षेत्र स्थित महारानी बाग में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में मंगलवार को आध्यात्मिकता, भक्ति और ज्ञान का अनूठा संगम देखने को मिला, जहां कथा के तीसरे दिन व्यासपीठ पर विराजमान महाराज दिनेश दीक्षित ने महात्मा और संतत्व की मूल परिभाषा भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि महात्मा होने का संबंध न धन से है और न ही परिधान से, बल्कि उसके स्वभाव, त्याग, दृष्टि और विश्वकल्याण की भावना से है। संत वही है जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपना परिवार मानकर सर्वजन हिताय की बात करता है।
महाराज ने उदाहरण देते हुए कहा कि चाकू आतंकवादी, चोर और सर्जन- तीनों के पास होता है, लेकिन उसके उपयोग से ही व्यक्ति की पहचान होती है। संतों की सच्ची शरण हमें ईश्वर तक पहुंचने का सही मार्ग देती है। उन्होंने गुरु महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन कितना भी भ्रमित क्यों न हो, सच्चा गुरु ही व्यक्ति को आत्मज्ञान, सत्य और भक्ति की राह दिखाता है।
कथा के दौरान राजा परीक्षित को श्राप मिलने, श्रंगी ऋषि के क्रोध, परीक्षित द्वारा अपने अंतिम सात दिनों में परम सत्य की खोज और महायोगी शुकदेव द्वारा उन्हें श्रीमद्भागवत पुराण का उपदेश देने की दिव्य कथा का संगीतमय वर्णन किया गया। इसी क्रम में विदुर चरित्र द्वारा धर्म, नीति, विवेक और ज्ञान की महिमा बताई गई जबकि सती चरित्र के माध्यम से शिवभक्ति के अद्भुत स्वरूप को विस्तार से समझाया गया।
भक्ति रस से सराबोर कथा में भजनों पर श्रद्धालु देर तक झूमते और नृत्य करते रहे। कथा विराम के पश्चात भक्तों ने आरती की और प्रसाद ग्रहण किया।
कार्यक्रम में आयोजन समिति के डॉ. जीएस राणा, अनीता राणा, संयोजक डॉ. अरुण प्रताप सिंह, सारिका अग्रवाल, संदीप अग्रवाल, कृष्णा अरुण त्यागी, रजनी मित्तल, महेश चंद्र, राजरानी, ममता, कावेरी बिल्डर फौजदार साहब, रेनू चौधरी, प्रवीण कुमार, ममता कटारा, हरदेव शर्मा और शिवम कटारा सहित अनेक भक्त उपस्थित रहे। कथा के चौथे दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का उत्सव मनाया जाएगा।