उप राष्ट्पति पद से जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: खराब स्वास्थ्य, नाराजगी, आत्मसम्मान या सत्ता संघर्ष?
नई दिल्ली। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि कई राजनीतिक सवालों को भी जन्म दे दिया है। सबसे बड़ा सवाल है कि उन्होंने स्वयं यह निर्णय लिया या यह एक ‘संदेश’ के तहत लिया गया कदम था, लेकिन घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने पर यह साफ होता जा रहा है कि भाजपा और केंद्र सरकार की नाराजगी इस फैसले की प्रमुख पृष्ठभूमि रही। धनखड़ का इस्तीफा अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। खासकर विपक्ष इस कोशिश में है कि इस मुद्दे को लेकर पीएम मोदी को घेरा जाए।
सरकार से टकराव की पहली लकीर: महाभियोग प्रस्ताव
धनखड़ के इस्तीफे से पहले जस्टिस वर्मा के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव को लेकर जो घटनाक्रम सामने आए, उन्होंने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया था। सरकार चाहती थी कि यह प्रस्ताव पहले लोकसभा में आए, ताकि प्रक्रिया पर नियंत्रण बना रहे और गठित होने वाली जांच समिति का नेतृत्व लोकसभा अध्यक्ष करें। लेकिन धनखड़ ने कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा लाए गए प्रस्ताव को राज्यसभा में पढ़ दिया और आगे की प्रक्रिया भी शुरू कर दी, बिना सरकार को भरोसे में लिए।
यह कदम सीधे-सीधे उप राष्ट्रपति द्वारा सरकार की रणनीति को काटने जैसा था। यह भी कहा जा रहा है कि खड़गे का प्रस्ताव उन्होंने अपने आवास पर स्वीकार किया, जिससे भाजपा और भी अधिक चौंक गई। उप राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई एक बैठक में भाजपा की अनुपस्थिति और फिर उसी शाम इस्तीफे की घोषणा, इन दोनों घटनाओं का मेल एक संदेह पैदा करता है कि धनखड़ के सामने इस्तीफे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।
सरकार की नाराजगी और बढ़ते संकेत
धनखड़ का रुख केवल महाभियोग प्रस्ताव तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इससे पहले केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को सार्वजनिक रूप से किसानों के मुद्दे पर सार्वजनिक मंच से न केवल घेरा था, बल्कि फटकारने के अंदाज में जवाब तलब किया। इससे भी सरकार असहज थी, लेकिन फिर भी चुप्पी साधे रही। इससे पहले भी उन्होंने कई मंचों से ऐसी बातें कही थीं, जो सरकार और भाजपा के लिए अप्रत्याशित थीं। मसलन सरकारी इमारतों में उप राष्ट्रपति के चित्र लगाने की सार्वजनिक इच्छा और इसी तरह की कुछ और बातें।
ये बातें उनके भीतर एक गहरे आत्मसम्मान या सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी की आकांक्षा को दर्शा रही थीं, लेकिन सरकार और भाजपा इस पर यह सोचकर चुप्पी साधे रहीं कि अपनी पार्टी के उप राष्ट्रपति के बारे में कुछ कदम उठाएंगे तो बहुत विषम परिस्थिति बन जाएगी।
न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणियों से भी सरकार थी बेचैन
धनखड़ द्वारा न्यायपालिका पर की जा रही टिप्पणियों से भी सरकार खुद को मुश्किल में पा रही थी। उन्हें कई बार न्यायपालिका के कार्यों को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाते हुए देखा गया, जिससे यह धारणा बनने लगी कि वे सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन जब यही आलोचना बार-बार होने लगी, तो सरकार को यह डर सताने लगा कि इससे संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव का माहौल बन सकता है, जिसकी राजनीतिक कीमत सरकार को चुकानी पड़ सकती है।
खटकने वाले विपक्ष की आंखों के तारे बने
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस्तीफे के बाद जगदीप धनखड़ विपक्ष की आंखों के तारे बन गये हैं। जो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल उन्हें हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव ला चुके थे, अब वही सारी पार्टियां जगदीप धनखड़ को निष्पक्ष बताते नहीं थक रहीं। हालांकि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी धनखड़ के मामले में पूरी तरह चुप हैं। विपक्ष के रुख में आए इस बदलाव के बाद अब यह मामला पूरी तरह राजनीतिक होता जा रहा है। विपक्ष बार-बार यह कहकर सरकार को घेर रहा है कि धनखड़ के इस्तीफे की वजह सामने आनी चाहिए।
सवाल- क्या सत्यपाल मलिक की राह पर जाएंगे
चर्चाएं तो अब यह भी होने लगी हैं कि क्या वे सत्यपाल मलिक की राह पर हैं। हालांकि इस्तीफे के बाद धनखड़ पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन अगर आगामी समय में यदि धनखड़ भाजपा के विरुद्ध मुखर होते हैं, तो उनका यह इस्तीफा भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हो सकता है। राजनीतिक प्रेक्षक यह मान रहे हैं कि धनखड़ चुप बैठने वाले नहीं हैं। वे उचित समय पर कुछ ऐसा बोलेंगे जो सरकार के लिए मुसीबत खड़ी करे।