कामाख्या माता मंदिर बनाम वक़्फ़ बोर्ड: फतेहपुर सीकरी की ऐतिहासिक विरासत पर अदालत में 7 फरवरी को अहम सुनवाई
आगरा। फतेहपुर सीकरी स्थित सलीम चिश्ती दरगाह और जामा मस्जिद को लेकर लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद में अगली अहम सुनवाई 7 फरवरी को होगी। यह मामला योगेश्वर श्रीकृष्ण सांस्कृतिक अनुसंधान संस्थान ट्रस्ट द्वारा दायर केस संख्या 113/2024 – श्री भगवान श्री कामाख्या माता आदि बनाम उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड आदि के रूप में लघुवाद न्यायालय, आगरा में विचाराधीन है।
वादी पक्ष के अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने बताया कि ऐतिहासिक नगर फतेहपुर सीकरी, जो मूल रूप से विजयपुर सीकरी के नाम से जाना जाता था, सिकरवार हिंदुओं की राजधानी रहा है। वाद में दावा किया गया है कि फतेहपुर सीकरी स्थित सलीम चिश्ती दरगाह दरअसल सिकरवार हिंदुओं की कुलदेवी कामाख्या माता मंदिर का मूल गर्भगृह है, जबकि जामा मस्जिद उसी मंदिर का विस्तृत मंदिर परिसर रही है।
अधिवक्ता के अनुसार, विजयपुर सीकरी के अंतिम शासक राजा धामदेव सिकरवार थे। वर्ष 1527 ईस्वी में राणा सांगा और बाबर के बीच हुए युद्ध के बाद राजा धामदेव सिकरवार सीकरी छोड़कर गाजीपुर जनपद के गहमर क्षेत्र में जाकर बस गए थे। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में राजा धामदेव का उल्लेख “धरमदेव” के नाम से किया है।
वाद में यह भी कहा गया है कि राजा धामदेव सिकरवार अपने साथ अपनी कुलदेवी कामाख्या माता का विग्रह भी गहमर ले गए थे। वर्तमान में कामाख्या माता मंदिर गहमर में स्थापित है, जिसे इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का जीवित प्रमाण बताया गया है।
इस प्रकरण में विपक्षी संख्या 1 उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड, विपक्षी संख्या 2 प्रबंधन कमेटी दरगाह सलीम चिश्ती तथा विपक्षी संख्या 3 प्रबंधन कमेटी जामा मस्जिद न्यायालय में उपस्थित हो चुके हैं। विपक्षी संख्या 2 और 3 की ओर से आदेश 7 नियम 14 के अंतर्गत प्रस्तुत प्रार्थना पत्र फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है।
उल्लेखनीय है कि इस केस की सुनवाई पूर्व में 15 जनवरी को नियत थी, किंतु मकर संक्रांति के अवकाश के चलते सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 7 फरवरी निर्धारित कर दी।
फतेहपुर सीकरी की पहचान, उसके ऐतिहासिक चरित्र और धार्मिक स्वरूप से जुड़े इस प्रकरण को लेकर न्यायिक निर्णय पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। यह मामला न केवल एक धार्मिक स्थल की प्रकृति तय करेगा, बल्कि सीकरी के इतिहास की व्याख्या को भी नई दिशा दे सकता है।