यूपी भाजपा अध्यक्ष रेस में कठेरिया सबसे आगे, कई और नाम चर्चा में
लखनऊ। भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पर फैसला होना है। वजह साफ है—यूपी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला है और यहां का समीकरण सीधे लोकसभा 2029 तक के रोडमैप को प्रभावित करेगा। पार्टी को ऐसे नेता की तलाश है जो आरएसएस से जुड़ा हुआ, वैचारिक रूप से मजबूत और जातीय संतुलन साधने वाला हो।
लखनऊ। भाजपा में इस बार राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पर फैसला होना है। वजह साफ है—यूपी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला है और यहां का समीकरण सीधे लोकसभा 2029 तक के रोडमैप को प्रभावित करेगा। पार्टी को ऐसे नेता की तलाश है जो आरएसएस से जुड़ा हुआ, वैचारिक रूप से मजबूत और जातीय संतुलन साधने वाला हो।
रामशंकर कठेरिया का नाम इस रेस में सबसे आगे बताया जा रहा है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे दलित समाज से आते हैं और भाजपा समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) नैरेटिव को कमजोर करने के लिए इस कार्ड को खेल सकती है। कठेरिया का गृह क्षेत्र इटावा सपा का गढ़ माना जाता है। अगर वे यहां संगठन को मजबूत करते हैं तो भाजपा को यादव बेल्ट में सीधा फायदा हो सकता है। इसके अलावा वे 13 वर्षों तक आरएसएस के प्रचारक रहे हैं, दलित चेतना पर गहन अध्ययन किया है और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के साथ-साथ केंद्र सरकार में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। उनका अनुभव और इटावा–आगरा बेल्ट में पकड़ उन्हें अन्य दावेदारों से अलग खड़ा करती है।
हालांकि कठेरिया की दावेदारी मजबूत है, लेकिन पार्टी अन्य विकल्पों पर भी विचार कर रही है। पश्चिम यूपी से वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी के नाम पर दुबारा से विचार किया जा रहा है। वह ओबीसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं और संगठन में सक्रिय माने जाते हैं। वाराणसी क्षेत्र से अनिल राजभर पिछड़े वर्ग में लोकप्रिय नेता हैं। पूर्वांचल से हरीश द्विवेदी को युवा ब्राह्मण चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है, जो ब्राह्मण असंतोष को कम कर सकते हैं। इसके अलावा दलित महिला नेताओं जैसे बेबी रानी मौर्य या अनुपमा जायसवाल के नाम पर भी चर्चा है, ताकि भाजपा विपक्ष के महिला और पीडीए कार्ड को काट सके। स्वतंत्र देव सिंह, जो पहले प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, का नाम भी बातचीत में आता है, हालांकि दोबारा मौका मिलने की संभावना कम ही मानी जा रही है।
समीकरण की बात करें तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूर्वी यूपी से आते हैं, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य प्रयाग क्षेत्र से और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक लखनऊ व ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में संतुलन बनाने के लिए अब पार्टी की नजर दलित चेहरे पर है और कठेरिया इसमें फिट बैठते हैं।
भाजपा की रणनीति साफ है। अखिलेश यादव ने पीडीए नैरेटिव के जरिए दलित और पिछड़ों को साथ लाने की कोशिश की है। भाजपा चाहती है कि एक मजबूत दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर विपक्ष की इस रणनीति को कमजोर किया जाए। इसके अलावा यूपी में जातीय संतुलन का संदेश पूरे देश में जाएगा और इससे भाजपा को अन्य राज्यों में भी फायदा हो सकता है।
कुल मिलाकर भाजपा का अगला प्रदेश अध्यक्ष सिर्फ संगठनात्मक पदाधिकारी नहीं होगा, बल्कि लोकसभा 2029 के लिए रणनीतिक मोहरा भी साबित होगा। रामशंकर कठेरिया अपनी पृष्ठभूमि, अनुभव और जातीय समीकरण की वजह से सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अंतिम फैसला भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व और आरएसएस की सहमति पर ही निर्भर करेगा।