साहित्य का दीप अब भी जलता हैः प्रो. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी की स्मृति में तीन कृतियों का हुआ लोकार्पण
आगरा। शब्दों के साधक, व्यंग्य और निबंधों के अमिट हस्ताक्षर प्रो. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी की साहित्यिक विरासत को नए युग तक पहुंचाने का भावनात्मक प्रयास रविवार को आगरा पब्लिक स्कूल विजय नगर में देखने को मिला। यहां उनके स्मृति ग्रंथ, हास्य-व्यंग्य संग्रह और साहित्य निबंध संकलन का लोकार्पण हुआ। समारोह में वक्ताओं ने कहा कि प्रो. चतुर्वेदी ने जो साहित्यिक धरोहर छोड़ी है, वह भारतीय भाषा और संस्कृति के रचनात्मक विरासत की अनुपम मिसाल है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री डॉ. आर.एस. पारीक ने कहा कि डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने दुर्लभ रचनाएं रची हैं, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का दीप सदैव जलता रहना चाहिए। जिस प्रकार इंग्लैंड का स्ट्रैटफोर्ड शेक्सपियर के नाम से पहचाना जाता है, वैसे ही आगरा में चतुर्वेदी जी जैसे रचनाकारों की स्मृतियां जीवित रहनी चाहिए।
मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. (डॉ.) उषा यादव ने कहा कि डॉ. चतुर्वेदी ने जो रेखाएं साहित्य में खींची हैं, उनमें रंग भरने का कार्य उनका परिवार कर रहा है। उनका मानवीय दृष्टिकोण और समाज से जुड़ाव आज भी प्रेरणास्रोत है।
उपकार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तीनों ग्रंथों में ‘प्रो. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ’, हास्य-व्यंग्य और साहित्य निबंधों का चयनित संकलन शामिल है। संपादन प्रो. आभा चतुर्वेदी, प्रो. सुषमा सिंह, रामानुज भारद्वाज, संजय मिश्र और नेहा चतुर्वेदी ने किया है, जबकि सहयोग में डॉ. निशीथ चतुर्वेदी, रमेश पंडित, ब्रज बिहारी लाल ‘बिरजू’ और डॉ. अरुण राघव का योगदान रहा।
विशिष्ट अतिथि संस्कृतिकर्मी अरुण डंग ने कहा कि तकनीक का विस्तार हो सकता है, लेकिन साहित्य की आत्मा कभी समाप्त नहीं होती।
स्वागत भाषण में डॉ. राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल दिल्ली के रिटायर्ड डायरेक्टर डॉ. निशीथ चतुर्वेदी ने डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को रेखांकित किया। अमित चतुर्वेदी ने भी विचार व्यक्त किए। प्रो. आभा चतुर्वेदी ने भावुक स्वर में कहा कि पिताजी को अंतिम दिनों तक लिखते हुए देखा। 104 बुखार में भी वे पांडुलिपियां तैयार करवा रहे थे। उनकी लेखनी हमारे लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है।
महेश शर्मा ने बताया कि बहन आभा चतुर्वेदी के घर अलमारियों में रखे मसौदे देखकर ही इन ग्रंथों के प्रकाशन का सुझाव दिया गया, जो पांच वर्षों की मेहनत के बाद साकार हुआ।
अन्य वक्ताओं में डॉ. रंजीत सिंह भदौरिया, प्रो. बीना शर्मा, प्रो. शैफाली चतुर्वेदी, डॉ. नीलम भारद्वाज, डॉ. मधु भारद्वाज, संजय मिश्रा और रामानुज भारद्वाज शामिल रहे।
समारोह का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों पद्मश्री डॉ. आर.एस. पारीक, पद्मश्री डॉ. उषा यादव, अरुण डंग, महेश शर्मा, डॉ. निशीथ चतुर्वेदी और अमित चतुर्वेदी द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। शुभारंभ के बाद सुशील सरित ने शारदा वंदना प्रस्तुत की। मंच संचालन श्रुति सिन्हा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन महेश शर्मा ने दिया।
स्वागत प्रो. आभा चतुर्वेदी, शुभ्रा चतुर्वेदी, संजय मिश्रा, रामानुज भारद्वाज, अंजना चतुर्वेदी, गोपाल मिश्र, ज्ञानेश चतुर्वेदी, किशन चतुर्वेदी, नेहा चतुर्वेदी मुस्कान चतुर्वेदी आदि ने किया। धन्यवाद ज्ञापन महेश शर्मा ने किया।