नशे के ठेकों से बस्तियों का चैन लुटाः सामाजिक कार्यकर्ता का सुझाव- शराब के ठेके हटाकर बनें वाइन जोन!
आगरा। न्यू आगरा थाना क्षेत्र के नगला बूढ़ी में बेकाबू कार से सात लोगों के कुचले जाने और इनमें से पांच की मौतों ने शहर को झकझोर दिया है। इस त्रासदी के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं टूटी है। घनी आबादी, दलित और मलिन बस्तियों में खुले शराब के ठेकों के बाहर खुलेआम जाम छलकते हैं, महिलाएं असुरक्षा में हैं और सड़कों पर नशे का उत्पात मचता रहता है। इस विकराल स्थिति पर सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस ने डीएम व कमिश्नर को पत्र भेजकर ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनका सुझाव है कि ठेकों को आबादी से हटाकर वाइन जोन में शिफ्ट किया जाए, जहां निगरानी, नियंत्रण और जिम्मेदारी तय हो।
वर्तमान में शहर में जगह-जगह संचालित शराब के ठेकों ने अब जनजीवन को असुरक्षित बना दिया है। इन ठेकों के बाहर दिन-रात लोग ग्रुप बनाकर शराब पीते हैं। महिलाओं और छात्राओं से छींटाकशी, गाली-गलौज और झगड़ों की घटनाएं आम हो चुकी हैं। आए दिन इन ठेकों के पास से उत्पात, उत्पीड़न और सड़क हादसों की खबरें सामने आती रहती हैं।
नगला बूढ़ी इलाके में एक कार चालक ने सात लोगों को कुचल दिया, जिसमें पांच लोगों की मौके पर मौत हो गई थी। यह हादसा सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासन की लापरवाही और समाज की संवेदनहीनता का आईना है।
सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस ने इस घटना के बाद डीएम और कमिश्नर को भेजे पत्र में कहा है कि शहर के अंदरूनी आवासीय और दलित बस्तियों में शराब के ठेके खोलना कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को सुरक्षित जीवन का अधिकार है, परंतु इन ठेकों से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा खतरे में है।
पारस ने अपने पत्र में अनुच्छेद 46 और उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34 का हवाला देते हुए कहा है कि राज्य सरकार पर दलित वर्गों की सुरक्षा का दायित्व है। लेकिन शराब के ठेके इन इलाकों में खुलवाकर प्रशासन ने सीधे तौर पर संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना की है।
उन्होंने मांग की कि ऐसे सभी ठेके तत्काल बंद कर शहर की सीमाओं या औद्योगिक क्षेत्रों में वाइन जोन बनाकर स्थानांतरित किए जाएं, जहां सीमित समय (सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक) तक बिक्री हो और सीसीटीवी निगरानी के साथ पुलिस नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।
नरेश पारस ने यह भी कहा कि जिन आबकारी अधिकारियों ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इन ठेकों की अनुमति दी, उनके विरुद्ध विभागीय जांच व दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही भविष्य में किसी भी नए ठेके से पहले जनसुनवाई अनिवार्य की जाए।
उन्होंने सुझाव दिया कि नशा मुक्त शहर अभियान के अंतर्गत नशा-निवारण केंद्र स्थापित किए जाएं, शराब ठेकों का हर छह माह में लाइसेंस पुनरीक्षण किया जाए, और ठेकों के 200 मीटर दायरे में न तो विद्यालय हों, न धार्मिक स्थल या आवासीय परिसर।
नरेश पारस ने कहा कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, महिला सम्मान और संविधानिक मूल्यों का सवाल है। दलित और गरीब बस्तियों में शराब के ठेके वहां के सामाजिक ढांचे को तोड़ रहे हैं और महिलाओं की गरिमा को रौंद रहे हैं। उन्होंने मांग की कि डीएम तत्काल आदेश जारी कर इन ठेकों को आबादी से हटवाएं और वाइन जोन पॊलिसी को लागू करें।