लव जिहाद: क्या समाज और परिवार अब भी आंखें मूंदें रहेंगे?
लव जिहाद की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए क्या हमारे समाज, परिवार, स्कूल और संस्थाएं इस गंभीर विषय पर बेटियों को सही जानकारी और चेतावनी देने के लिए तैयार हैं? धोखे के नाम पर होने वाले प्यार को रोकने के लिए सामाजिक चेतना, पहचान के उपाय और सच्चे संवाद की जरूरत है।
-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
क्या माता-पिता अपनी संतानों को बताते हैं कि लव जिहादी और हिंदू में क्या फर्क है, और कैसे पहचान कर सकते हैं? क्या किसी स्कूल में यह बातें समझाई जाती हैं? फिर वो कन्या कैसे अपनी सुरक्षा कर सकती है, जब उसे ज्ञान ही न हो? बात थोड़ी पेचीदा तब हो जाती है जब झींगुर बाबा सरीखे लोग इस धर्मांतरण में पैसों का इनाम देने वाले अब जगह-जगह पाए जा रहे हैं।
स्वतः हो, और बिना धोखे के हो, सब जानकर ही हो कि अगला मुसलमान है, हिंदू है या कोई गैर-मुस्लिम नहीं, तो फिर किसको और क्यों आपत्ति होगी? मगर यदि कोई झींगुर बाबा मैच फिक्सिंग करवाता रहे, जिससे लोग अनभिज्ञ रहें, तब तो यह ठीक नहीं।
आखिर ये लड़कियां सही तरह से पहचानें कैसे, जब नाम हिंदू या ईसाई अथवा सिख का रखा हो, माथे पर टीका लगा लिया हो, हाथ में कलेवा या स्टील का कड़ा पहना हो, मंदिर, गुरुद्वारे, जैनालय, बौद्ध मठ, चर्च में भी आता-जाता हो? प्यार का दिखावा इस कदर से करता हो कि लड़की यह जान ही न पाए कि वह लव जिहाद का शिकार बन रही है। वहीं लव जिहादी को सफल होने पर दस-पंद्रह लाख या उससे ज़्यादा भी रुपये इनाम में झींगुर बाबा सरीखे लोगों से मिल जाने वाले हों। पानी सिर से ऊंचा निकल जाने पर फिर कुछ भी कर गुजरने पर आमादा होने के सिवाय और क्या रास्ता बचता है?
पहलगाम में आतंकियों ने पुरुषों के पैंट और अंडरवियर उतरवाकर पहचाना था कि किसे छोड़ना है और किसको उनके हाथों मरना था। जब लव जिहाद की समस्या बढ़ती ही जा रही हो, तो क्या स्कूलों-कॉलेजों में, घरों में, एनजीओ द्वारा, अब से "गुड टच-बैड टच" के साथ-साथ हिंदू, सिख, पारसी, बौद्ध, ईसाई लड़कियों को लव जिहाद के बारे में नहीं बताना चाहिए? और सबसे महत्वपूर्ण बात- आसानी से पहचान में आने वाले फर्क को क्या अब भी संकोच में नहीं बताया जाना चाहिए?
उन परिवारों को क्या लगता है कि यदि उन्हें या उनकी भोली-भाली संतानों को यह छोटा सा और दूरगामी फर्क का समय से ज्ञान होता तो क्या वे साजिश का शिकार बन पातीं? एक जमाने में खजुराहो के कुछेक मंदिरों ने भी अपनी तरह से यह कोशिश की थी। प्यार आखिर प्यार है- फिर वो तो किसी से भी हो सकता है। पर धोखे से न हो, यही समझदारी व सतर्कता की ज़रूरत है।
समाज इस दिशा में पहल करे। चाहे तो इस लिटमस टेस्ट वाली पहचान के तरीकों को कन्याओं तक किसी तरह से जल्दी से जल्दी पहुंचाए। साथ ही समाज को अब सोचना पड़ेगा कि कब तक हम अति संकोची ही बन कर रहना चाहेंगे? कब तक नैतिकता के प्रहरी इसकी ज़िम्मेदारी अकेले ही उठाते रहेंगे?
क्या समाज तैयार है कि लव जिहाद बदस्तूर चलता रहे और झींगुर बाबा सरीखे लोग और उनके पास तक पैसा पहुंचाने वाले लोग पैसा इनाम में देकर लव जिहाद को बढ़ाते रहें? और यदि सब कुछ जानते और समझते हुए भी कोई कन्या लव जिहाद में अपनी इच्छा से जाना चाहे तो फिर उसके माता-पिता व परिवार उसे अपना आशीर्वाद दे।
(लेखक कारगिल योद्धा, अंतरराष्ट्रीय ख्याति के डॉक्टर एवं वैज्ञानिक, एक राष्ट्रीय प्रोफेसर हैं। उत्तर प्रदेश की एक क्षत्रिय महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं।)