एनसीईआरटी की हिंदी किताब में ढेरों गलतियां: टैगोर की मां का नाम बदला, जय प्नकाश नारायण बने 'अग्रवाल'
आगरा। एनसीईआरटी द्वारा निर्धारित कक्षा 9वीं की हिंदी की पुस्तक इन दिनों भारी प्रूफ त्रुटियों और तथ्यात्मक ग़लतियों को लेकर विवादों में है। यह पुस्तक न तो किसी पाठ्यक्रम बदलाव की वजह से चर्चाओं में है और न ही किसी राजनीतिक संदर्भ में, बल्कि इसमें हुई गंभीर वर्तनी व तथ्यगत गलतियों के कारण शिक्षा जगत में हैरानी है।
पेज 85: व्याख्या में त्रुटियां, शिक्षक भी हुए परेशान
पुस्तक के पृष्ठ संख्या 85 पर पद्यांश व्याख्या में इतनी अधिक प्रूफ की गलतियां हैं कि अध्यापक तक इसे पढ़ाकर भ्रम में पड़ जा रहे हैं। कई स्थानों पर भाषा की संरचना और शब्दों का चयन इतना त्रुटिपूर्ण है कि अर्थ का अनर्थ हो गया है।
पेज 61: प्रश्नों में तथ्य और वर्तनी दोनों ग़लत
पृष्ठ संख्या 61 पर प्रश्नावली में ‘नोबेल पुरस्कार’ को ‘नोबेन’ लिखा गया है और ‘सम्पन्न’ को ‘सम्पन’। यह गंभीर शैक्षणिक चूक मानी जा रही है, क्योंकि विद्यार्थी इसे ही सही मानकर आगे भी दोहराते रहेंगे।
पेज 26: जय प्रकाश नारायण बने 'जय प्रकाश अग्रवाल'
और भी चौंकाने वाली गलती पुस्तक के पृष्ठ 26 पर देखी गई, जहां लोकनायक जय प्रकाश नारायण का नाम ‘जय प्रकाश अग्रवाल’ छापा गया है। इसी पृष्ठ पर डॉ. राम मनोहर लोहिया का केवल ‘लोहिया जी’ लिखकर उल्लेख किया गया है, जबकि विद्यार्थियों को उनके नाम सहित पूरा परिचय और योगदान जानना ज़रूरी है।
टैगोर की माता बनीं 'शाखा देवी'
प्रसिद्ध साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर की माताजी का नाम इस पुस्तक में 'शाखा देवी' लिखा गया है, जबकि ऐतिहासिक रूप से सही नाम 'शारदा देवी' है। यह गलती शिक्षा की मूल आत्मा सत्य और संदर्भ को ही चुनौती देती है।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा अनुशंसित किताब
यह किताब एनसीईआरटी बेस्ड ‘हिंदी कक्षा 9’ नामक पुस्तक है जिसे माध्यमिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रमानुसार प्रकाशित किया गया है। इसमें एमआर आधारित पुनर्संयोजित प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र भी शामिल हैं, जो विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए तैयार करने हेतु बनाए गए हैं।
शिक्षकों और विशेषज्ञों की मांग
शिक्षकों और शिक्षाविदों ने मांग की है कि तत्काल प्रभाव से इन त्रुटियों का संशोधन किया जाए और एक त्रुटिरहित संस्करण विद्यालयों को भेजा जाए। उनका कहना है कि इस प्रकार की तथ्यात्मक चूक से विद्यार्थियों में भ्रम, गलत धारणाएं और ऐतिहासिक अक्षमता पैदा हो सकती है।
इस किताब में सामने आई त्रुटियों से यह सबक मिलता है कि शिक्षा सामग्री में गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने वाले संगठनों को प्रूफरीडिंग और फैक्ट चेकिंग को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। जब महापुरुषों के नाम और ऐतिहासिक सत्य ही गलत छप जाएं, तो इससे छात्रों की बुनियादी समझ और शिक्षक की विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ता है।