मथुरा वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस ने संयुक्त अभियान में सांभर हिरण को सुरक्षित बचाया
मथुरा। मथुरा जनपद के गोवर्धन रेंज अंतर्गत लोरियापट्टी गांव में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक वयस्क नर सांभर हिरण गांव की आबादी के बीच घूमता दिखाई दिया। स्थानीय लोगों की सतर्कता और त्वरित सूचना के बाद मथुरा वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस की संयुक्त रैपिड रिस्पांस टीम ने तत्काल अभियान चलाकर हिरण को सुरक्षित रेस्क्यू कर उसके प्राकृतिक आवास में स्थानांतरित कर दिया।
ग्रामीणों ने गांव में विशाल सांभर हिरण को देखकर भय के चलते तुरंत वन विभाग को सूचना दी। इसके बाद 24x7 आपातकालीन हेल्पलाइन के माध्यम से वाइल्डलाइफ एसओएस की रैपिड रिस्पांस यूनिट को अलर्ट किया गया। सूचना मिलते ही एक पशु चिकित्सक समेत छह सदस्यीय प्रशिक्षित टीम मौके पर पहुंच गई।
सुरक्षित तरीके से हिरण को नियंत्रित करने के बाद टीम ने मौके पर ही उसका गहन चिकित्सीय परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि सांभर अत्यधिक थका हुआ था और उसके पिछले हिस्से में खरोंच के घाव थे। टीम द्वारा तत्काल प्राथमिक उपचार और आवश्यक चिकित्सा सहायता दी गई, जिससे उसकी स्थिति स्थिर हो सकी।
इलाज के बाद सांभर हिरण को सुरक्षित रूप से उसके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में ले जाकर छोड़ दिया गया, ताकि जानवर और स्थानीय निवासियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
मथुरा के डीएफओ वेंकट श्रीकर पटेल ने कहा कि ग्रामीणों की समय पर सूचना और वन विभाग व वाइल्डलाइफ एसओएस के समन्वय से स्थिति को प्रभावी ढंग से संभाला गया। ऐसे सहयोग से मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में मदद मिलती है।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने बताया कि समय पर मिली जानकारी से टीम को तुरंत कार्रवाई कर हिरण को आवश्यक उपचार उपलब्ध कराने में सफलता मिली। संस्था के पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशक डॉ. इलयाराजा एस के अनुसार, हिरण अत्यधिक तनाव में था और चोटें संभवतः गांव में घूमते समय लगी थीं, जिनका तत्काल उपचार किया गया। वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंजरवेशन प्रोजेक्ट्स बैजूराज एम.वी. ने कहा कि जंगलों के सिमटने और भोजन-पानी की तलाश में सांभर जैसे वन्यजीव मानव बस्तियों में आ जाते हैं, ऐसे में उनका सुरक्षित स्थानांतरण बेहद आवश्यक हो जाता है।
संरक्षित और संवेदनशील प्रजाति
सांभर हिरण (रूसा यूनिकलर) भारत की सबसे बड़ी हिरण प्रजातियों में से एक है। इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित किया गया है और आईयूसीएन रेड लिस्ट में ‘वल्नरेबल’ श्रेणी में रखा गया है। प्राकृतिक आवास के क्षरण और मानवीय अतिक्रमण के चलते इनके मानव क्षेत्रों में भटकने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
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