रक्षा क्षेत्र का मेगा गेमचेंजर, फ्रांस से 114 राफेल खरीद पर मंथन

भारत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रहा है। करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का यह सौदा मंजूरी मिलने पर देश का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। इसके तहत कुछ विमान सीधे उड़ान योग्य हालत में मिलेंगे, जबकि अधिकांश का निर्माण भारत में होगा। इस डील से वायुसेना की ताकत बढ़ेगी, मेक इन इंडिया को प्रोत्साहन मिलेगा और भारत की रक्षा तैयारियों को नई मजबूती मिलेगी।

Jan 14, 2026 - 23:00
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रक्षा क्षेत्र का मेगा गेमचेंजर, फ्रांस से 114 राफेल खरीद पर मंथन
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3.25 लाख करोड़ का हो सकता है सबसे बड़ा सौदा, भारत में बनेगा बड़ा हिस्सा, राफेल से मजबूत होगी वायुसेना की ताकत

नई दिल्ली। भारत की सैन्य क्षमताओं को अभूतपूर्व मजबूती देने वाला एक ऐतिहासिक रक्षा सौदा जल्द आकार ले सकता है। रक्षा मंत्रालय इस सप्ताह फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के प्रस्ताव पर अहम बैठक करने जा रहा है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जो मंजूरी मिलने पर भारत का अब तक का सबसे महंगा रक्षा सौदा होगा।

सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर पहले रक्षा मंत्रालय के आंतरिक स्तर पर चर्चा होगी, जिसके बाद इसे अंतिम निर्णय के लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के समक्ष भेजा जाएगा। अगर सौदे को हरी झंडी मिलती है, तो भारतीय सशस्त्र बलों में राफेल विमानों की कुल संख्या 176 तक पहुँच जाएगी। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास 36 राफेल हैं, जबकि भारतीय नौसेना ने पिछले वर्ष 26 राफेल मरीन विमानों का ऑर्डर दिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित डील के तहत 12 से 18 राफेल विमान सीधे ‘रेडी-टू-फ्लाई’ स्थिति में भारत को मिल सकते हैं, जिससे वायुसेना की तात्कालिक जरूरतों को पूरा किया जा सके। शेष अधिकांश विमान भारत में ही निर्मित किए जाएंगे, जिनमें लगभग 30 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री शामिल होने की संभावना है। हालांकि यह प्रतिशत सामान्य ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा सौदों की तुलना में कम है, जहां आमतौर पर 50 से 60 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण की शर्त होती है।

भारत इस सौदे में फ्रांस से यह भी चाहता है कि राफेल विमानों में भारतीय हथियार और स्वदेशी सिस्टम एकीकृत करने की अनुमति दी जाए। हालांकि, विमानों का सोर्स कोड फ्रांस के पास ही रहेगा, जो इस डील की एक अहम शर्त मानी जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है, जब अमेरिका ने भारत को F-35 और रूस ने Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की पेशकश की है। इसके बावजूद भारत राफेल पर भरोसा जताते हुए इस सौदे को आगे बढ़ा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह हाल ही में हुआ ऑपरेशन सिंदूर बताया जा रहा है, जिसमें दावा किया गया कि राफेल ने पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान चीनी PL-15 मिसाइलों को अपने SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से निष्क्रिय किया।

इस डील के तहत फ्रांस भारत में रक्षा उद्योग को और मजबूत करने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है। जानकारी के अनुसार, हैदराबाद में राफेल के M-88 इंजन के लिए मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा शुरू करने की योजना है। डसॉल्ट एविएशन पहले ही भारत में मेंटेनेंस से जुड़ी कंपनी स्थापित कर चुका है और टाटा समेत कई भारतीय कंपनियों के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने की संभावना है।

मौजूदा रणनीतिक हालात को देखते हुए भारत को लड़ाकू विमानों की तत्काल आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना की रीढ़ मुख्य रूप से Su-30 MKI, राफेल और स्वदेशी LCA तेजस विमानों पर आधारित होगी। भारत पहले ही 180 LCA तेजस मार्क-1A का ऑर्डर दे चुका है। इसके साथ ही, 2035 के बाद स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को बड़ी संख्या में शामिल करने की भी दीर्घकालिक योजना है।