मोरारी बापू बोले- ताजमहल से पहले भीतर के ‘तेजो महल’ को देखिए, रामकथा में गूंजा श्रीराम जन्म का मंगलगान
आगरा के जेपी वेडिंग ग्राउंड में चल रही मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा के छठवें दिन प्रभु श्रीराम के जन्म का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया गया। ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला’ के भाव के साथ कथा पंडाल राम जन्म की बधाइयों और जयघोष से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों के बीच श्रद्धालुओं ने ‘हाथी दियो, घोड़ा दियो... जय रघुवर लाल की’ के जयघोष के साथ राम जन्मोत्सव मनाया। बापू ने कथा के माध्यम से श्रद्धा, प्रेम, वैराग्य, करुणा और धर्मशीलता का संदेश भी दिया।
आगरा। करुणानिधान परिवार द्वारा जेपी वेडिंग ग्राउंड, फतेहाबाद रोड पर आयोजित मोरारी बापू की रामकथा के छठवें दिन जैसे ही प्रभु श्रीराम के जन्म का प्रसंग आया, कथा पंडाल भक्ति, उल्लास और भाव-विभोर वातावरण से भर उठा। बापू ने ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला कौशल्या हितकारी’ के भावपूर्ण वर्णन के साथ राम जन्म की लीला का ऐसा रसपूर्ण निरूपण किया कि श्रद्धालु श्रीराम-जानकी की भक्ति में अभिभूत हो गए। राम जन्म की बधाइयां गूंज उठीं और ‘हाथी दियो, घोड़ा दियो... जय रघुवर लाल की’ के जयघोष के बीच ढोल बजाए गए तथा बधाई लुटाई गई।
कथा के छठवें दिन का शुभारंभ मोरारी बापू ने रघुनंदन वंदन और हनुमत वंदन से किया। उन्होंने कहा कि आगरा में ‘आग भी है और राग भी’—‘आग’ का अर्थ जिज्ञासा और ‘राग’ का अर्थ किसी विशेष रूप में आकर्षण से है। 23 वर्ष पूर्व उन्होंने आगरा में ‘मानस तेजो महल’ का गायन किया था और आज ‘मानस ऋषि पंचमी’ की गाथा कह रहे हैं। बापू ने कहा कि उस समय भी उनका यही विचार था और आज भी है कि ताजमहल से पहले अपने भीतर के ‘तेजो महल’ को देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग उनसे पूछते हैं कि बापू ने ताजमहल देखा या नहीं? उनका उत्तर होता है कि उन्होंने पहले ‘मानस का तेजो महल’ देखा है।
कथा वही, जो श्रोता की दशा बदल दे
कथा अधिकारी का वर्णन करते हुए बापू ने कहा कि जिसके भीतर धैर्य और भजन है तथा जो बुद्धि पूर्वक कथा सुनता है, वही कथा का अधिकारी है। सूर्य की भांति किसी व्यक्ति का वास्तविक उदय या अस्त नहीं होता, जैसे सूर्य के चारों ओर पृथ्वी अपनी गति से घूमती है, वैसे ही मनुष्य की बुद्धि भी घूमती रहती है। उन्होंने कहा कि कथा केवल दिशा का ज्ञान देने वाली नहीं, बल्कि ऐसी होनी चाहिए जिससे श्रोता की दशा बदल जाए। प्रेम मार्ग की साधना में दिशा नहीं, दशा देखी जाती है। कथा का श्रोता बौद्धिक होने के साथ ‘नगद श्रद्धा’ वाला होना चाहिए, जिसके भीतर की विकृतियां कथा के प्रभाव से तत्काल समाप्त होने लगें।
‘बड़े भाग मनुष्य तनु पावा’ का स्मरण
बापू ने श्रीराम के उस संदेश का उल्लेख किया जिसमें मनुष्य जन्म को बड़े भाग्य से प्राप्त होने वाला बताया गया है। उन्होंने कहा कि सफलता-असफलता पर किसी प्रकार का घमंड नहीं होना चाहिए। यह समझना चाहिए कि सब कुछ केवल अपने बल से नहीं हो रहा, ईश्वर की कृपा भी उसके पीछे है। गुरु कृपा को उन्होंने मोबाइल के सिम कार्ड से जोड़ते हुए कहा कि सामान्य सिम कार्ड को बार-बार रिचार्ज करना पड़ता है, लेकिन गुरु ऐसी कृपा का ‘सिम कार्ड’ भीतर डाल देते हैं, जिससे सीमित से असीम की यात्रा शुरू होती है। इसमें आनंद, अखंड आनंद और गुरु कृपा का अनंत आनंद मिलता है।
परिवार में राज नहीं, वैराग्य की भावना हो
परिवारों को संदेश देते हुए बापू ने कहा कि परिवार में राज करने की भावना नहीं, वैराग्य और त्याग की भावना होनी चाहिए। उन्होंने एक भक्त की चिट्ठी का उल्लेख किया, जिसमें बताया गया था कि उसकी पत्नी किसी अन्य मिशन को मानती हैं, जबकि वह भक्त पिछले 15 वर्षों से व्यासपीठ के प्रति समर्पित है। बापू ने उस भक्त को मंच पर बुलाया और उसे ज्ञान की कुंजी देते हुए कहा—“मैं कंठी देने वाला साधु नहीं, कंठ में बैठने वाला साधु हूं।”
भक्ति की गंगा में ध्रुव, प्रह्लाद और हनुमान भी नहाए
बापू ने कहा कि भक्ति गंगा है, जिसमें ध्रुव नहाए, प्रह्लाद नहाए और हनुमान ने भी प्रेम किया। उन्होंने परीक्षित का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्ति का मार्ग मनुष्य को भीतर से निर्मल करता है। साधु के जीवन में पंचशील भाव की महत्ता बताते हुए बापू ने कहा कि साधु केवल धार्मिक दिखाई देने वाला व्यक्ति नहीं है। बहुत लोग धर्म की बात करते हैं, लेकिन धार्मिक नहीं होते। धार्मिक होने की परिभाषा कंठी-माला धारण करना नहीं, बल्कि धर्मशील होना है। तुलसीदास जी ने जनकपुर के लोगों के संदर्भ में धर्मशीलता का सुंदर वर्णन किया है।
साधु के पंचशील में धर्मशीलता, कर्मशीलता, करुणा और प्रेम
बापू ने साधु जीवन के गुणों की व्याख्या करते हुए कहा कि साधु कर्मशील होना चाहिए, उसके भीतर प्रमाणिकता और करुणा होनी चाहिए। यदि किसी को वेद और संवेदना में से विकल्प दिया जाए तो वेद का त्याग नहीं करना चाहिए, उसका प्रमाण करना चाहिए और संवेदना को अपने जीवन में उतारना चाहिए।
उन्होंने हनुमान जी के उदाहरण से बालशीलता की चर्चा की। कहा कि हनुमान जी ने श्रीराम का मार्ग आसान किया। लंका की विशेष व्यवस्था और वहां की परिस्थितियों का आनंद रामायण के प्रसंगों के माध्यम से उल्लेख करते हुए उन्होंने आनंद रामायण के अध्ययन से मिलने वाली अतिरिक्त जानकारियों की ओर भी ध्यान दिलाया। बापू ने पंचशील के पांचवें गुण के रूप में प्रेमशीलता को बताया। श्रीकृष्ण के ब्रजवासियों के प्रति प्रेम का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान से मिलने की सबसे सरल राह प्रेम और सुमिरन है।
‘रामकथा की ताली बजाते ही मिटते हैं संशय’
बापू ने कहा कि रामकथा भक्ति मार्ग पर उत्पन्न होने वाले संशयों को दूर करती है। अर्जुन को अपने संशयों के समाधान के लिए श्रीकृष्ण से 700 श्लोक सुनने पड़े, लेकिन वर्तमान समय में रामकथा रूपी ताली बजाते ही मनुष्य के अनेक संशय मिटने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म की हानि कथित धर्म से होती है। धर्म की लड़ाई धर्म से नहीं होती। उनके अनुसार सनातन धर्म मूल धारा है और अन्य परंपराओं को उसकी विभिन्न शाखाओं के रूप में देखा जा सकता है।
राम जन्म के पीछे ज्ञान, क्रिया और उपासना की शक्तियां
राम जन्म की महिमा का वर्णन करते हुए बापू ने मानस के विभिन्न प्रसंगों को जोड़ा। उन्होंने बताया कि भगवान शिव ने पहले पार्वती जी को रावण की कथा सुनाई और उसके बाद रामकथा का वर्णन किया। आदि शंकराचार्य के संदर्भ में उन्होंने राम जन्म की मातृशक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा कि कौशल्या को ज्ञान की शक्ति, सुमित्रा को उपासना की शक्ति और कैकेयी को क्रिया शक्ति के रूप में समझा जा सकता है।
बापू ने कहा कि श्रीराम का जन्म केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर ज्ञान, भक्ति, मर्यादा और करुणा के प्रकट होने का उत्सव भी है। राम जन्म का प्रसंग आगे बढ़ते ही कथा स्थल पर बधाइयों का दौर शुरू हो गया। ढोल-नगाड़ों की थाप और ‘हाथी दियो घोड़ा दियो, जय रघुवर लाल की’ के जयघोष के साथ श्रद्धालुओं ने राम जन्मोत्सव मनाया। पूरे पंडाल में भक्तिमय उल्लास छा गया और श्रद्धालु श्रीराम के जन्म की खुशी में झूम उठे।