डीपीएस कांड में नाबालिगों की पहचान उजागर होने पर राष्ट्रीय बाल आयोग सख्त, डीएम से 10 दिन में मांगी जवाबदेही रिपोर्ट

आगरा। शास्त्रीपुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में दो नाबालिग छात्रों के बीच हुए विवाद ने अब राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा कानूनी और प्रशासनिक मामला खड़ा कर दिया है। छात्रों के बीच हुआ झगड़ा पुलिस तक पहुंचा और जल्दबाजी में दर्ज हुई एफआईआर, सोशल मीडिया पर वायरल दस्तावेज़ों तथा नाबालिगों की पहचान सार्वजनिक होने के मामले को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने गंभीरता से लिया है।

May 17, 2026 - 17:06
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डीपीएस कांड में नाबालिगों की पहचान उजागर होने पर राष्ट्रीय बाल आयोग सख्त, डीएम से 10 दिन में मांगी जवाबदेही रिपोर्ट

चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट नरेश पारस एडवोकेट की शिकायत पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी से दस दिन के भीतर विस्तृत कार्यवाही रिपोर्ट तलब की है। आयोग के निदेशक वी. रामानधा रेड्डी ने सीपीसीआर अधिनियम की धारा 13(1) (जे) के तहत मामले में हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट संकेत दिए हैं कि नाबालिगों की पहचान उजागर करना गंभीर कानूनी उल्लंघन है और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।

यूट्यूबर पिता ने सार्वजनिक की नाबालिगों की पहचान

पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू यह सामने आया कि पीड़ित छात्र के पिता, जो एक यूट्यूबर बताए जा रहे हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मामले से जुड़े वीडियो और जानकारी सार्वजनिक कर दी। इतना ही नहीं, आरोपी छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर की प्रति भी वायरल हो गई, जिसमें नाबालिग छात्र का नाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था।

इस पूरे घटनाक्रम को बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन बताते हुए एडवोकेट नरेश पारस ने आयोग को भेजी शिकायत में कहा कि बच्चों की पहचान उजागर करना किशोर न्याय कानून के खिलाफ है और इससे उनके मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

पुलिस की जल्दबाजी पर भी उठे सवाल

शिकायत में कहा गया कि थाना सिकंदरा पुलिस ने आरोपी नाबालिग छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2) और 117(2) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया।

हालांकि, दोनों छात्र नाबालिग थे, इसके बावजूद प्राथमिकी दर्ज होने और उसकी प्रति सार्वजनिक हो जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

बताया गया कि घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस के उच्चाधिकारियों ने संज्ञान लेते हुए तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित भी कर दिया।

जेजे एक्ट की खुली अनदेखी

एडवोकेट नरेश पारस ने आयोग को भेजे अपने विस्तृत प्रार्थना पत्र में कहा कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम-2015 के तहत किसी भी नाबालिग की पहचान गोपनीय रखना अनिवार्य है।

इसके बावजूद आरोपी छात्र का नाम सार्वजनिक होना कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि आगरा पुलिस कमिश्नरेट में प्रत्येक माह बाल अधिकारों को लेकर बाल कल्याण अधिकारियों की कार्यशाला आयोजित की जाती है, लेकिन उसके बावजूद जमीनी स्तर पर पुलिसकर्मी जेजे एक्ट के प्रति संवेदनशील और प्रशिक्षित दिखाई नहीं दे रहे।

उन्होंने मांग की कि पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को बाल अधिकारों एवं किशोर न्याय कानूनों पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

आयोग ने डीएम से मांगा जवाब

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पूरे प्रकरण को गंभीर श्रेणी में रखते हुए जिलाधिकारी से दस दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।

आयोग ने संकेत दिए हैं कि यदि मामले में जिम्मेदार अधिकारियों, स्कूल प्रबंधन अथवा अन्य संबंधित व्यक्तियों की लापरवाही सामने आती है तो कठोर कार्रवाई की जा सकती है।

स्कूल प्रशासन की भूमिका भी जांच के घेरे में

शिकायत में डीपीएस स्कूल प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। नरेश पारस ने कहा कि स्कूल परिसर में छात्रों के बीच विवाद होने और मामला पुलिस तक पहुँचने के बाद यह देखना आवश्यक है कि घटना के समय सुरक्षा व्यवस्था क्या थी, स्कूल प्रशासन ने क्या कदम उठाए और बच्चों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए क्या प्रयास किए गए।

उन्होंने मांग की कि स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र एवं समयबद्ध जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।

वायरल सामग्री हटाने की मांग

शिकायत में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर वायरल वीडियो, एफआईआर की प्रति और अन्य सामग्री तत्काल हटवाई जाए ताकि बच्चों की पहचान और अधिक सार्वजनिक न हो।

साथ ही, भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट प्रोटोकॉल और डिजिटल कंट्रोल मैकेनिज्म लागू करने की भी मांग की गई है।

दोनों बच्चों की काउंसलिंग की मांग

बाल अधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस ने आयोग से आग्रह किया कि दोनों नाबालिग छात्रों को मनोवैज्ञानिक सहायता, काउंसलिंग और पुनर्वास उपलब्ध कराया जाए।

उन्होंने कहा कि यह मामला केवल दो छात्रों के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों की निजता, गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो बढ़ेगी खतरनाक प्रवृत्ति

नरेश पारस ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस मामले में कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में सोशल मीडिया ट्रायल, वायरल एफआईआर और नाबालिगों की पहचान सार्वजनिक करने जैसी खतरनाक प्रवृत्तियाँ और बढ़ेंगी।

उन्होंने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में कानून की संवेदनशीलता और गोपनीयता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, अन्यथा एक गलती किसी बच्चे के पूरे भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor