नौफरी कांड: युवाओं की पिटाई पर मानवाधिकार आयोग में पुलिस के खिलाफ केस दर्ज
आगरा। ताजगंज थाना क्षेत्र के नौफरी गांव में महाराणा प्रताप जयंती पर आयोजित कार्यक्रम के बाद पुलिसिया बर्बरता के मामले ने तूल पकड़ लिया है। 14 मई को महाराणा प्रताप के बोर्ड उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए 11 हिन्दू युवकों को पुलिस ने घर से उठाकर चौकी ले जाकर कथित तौर पर अमानवीय तरीके से पीटा और जेल भेज दिया। इस घटना के खिलाफ अब उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में केस दर्ज कराया गया है।
क्षत्रिय शक्तिपीठ विकास ट्रस्ट के अध्यक्ष अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने पुलिस की इस कार्रवाई को मानवाधिकारों का खुलेआम हनन बताते हुए एसीपी ताज सुरक्षा सईद अरीब अहमद सहित जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई है। आयोग में दर्ज केस की संख्या 10375/24/1/2025 है।
युवाओं को बिना आरोप, बिना सुनवाई पीटा गया
अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह के अनुसार, भारत के किसी कानून में यह नहीं लिखा है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को बर्बरता से पीटा जाए। पुलिस ने 11 युवाओं को अमानवीय यातनाएं दीं, जो संविधान और मानवाधिकारों के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि यदि पुलिस का यही रवैया रहा तो आम नागरिकों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने मांग की कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पुलिसकर्मियों पर कठोर कार्यवाही की जाए।
खेरागढ़ में भी दोहराया गया बर्बरता का खेल
अजय प्रताप सिंह ने एक अन्य मामले का ज़िक्र करते हुए बताया कि थाना खेरागढ़ क्षेत्र में भी पुलिस ने विवेक सिकरवार नामक युवक को एसीपी इमरान अहमद के निर्देश पर संज्ञेय अपराध की आशंका के नाम पर जेल भेज दिया, जबकि तलाशी में सिर्फ मोबाइल मिला था। उन्होंने कहा, क्या सिर्फ मोबाइल रखने वाला व्यक्ति संज्ञेय अपराध कर सकता है?
इस मामले में भी मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करवाई गई है, जिसकी केस संख्या 10330/24/1/2025 है। अधिवक्ता ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने का ऐलान किया।
बिना वकील, बिना दलील, बिना अपील जैसा हो गया है सिस्टम
उन्होंने कहा, आज ऐसा महसूस होता है जैसे हम ब्रिटिश राज में जी रहे हों, जहाँ किसी को भी पुलिस बिना कारण जेल भेज सकती है। न्यायालय की भूमिका नगण्य हो गई है।
अधिवक्ता ने कहा कि यदि उत्तर प्रदेश में इस तरह पुलिसिया तंत्र चलता रहा, तो आमजन का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा। हम मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए उच्चतम न्यायालय तक जाएंगे।