अमेजनवाद की ज़रूरत: डाक टिकट, सिक्के और नोट अब तिजोरियों से निकलकर जनता तक पहुंचें
नये डाक टिकट, फर्स्ट डे कवर, सिक्के और नोट जारी तो होते हैं, पर वे आम जनता तक पहुंचने से पहले ही गिने-चुने लोगों की तिजोरियों में कैद हो जाते हैं। प्रचार की कमी, सीमित उपलब्धता और व्यवस्था की जटिलता के कारण 99 प्रतिशत नागरिकों को इनके अस्तित्व तक की जानकारी नहीं मिल पाती। परिणामस्वरूप सरकारी धरोहरों का लाभ कुछेक जानकारों और जमाखोरों तक सिमट कर रह जाता है।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि देश में जब भी नया डाक टिकट, विशेष फर्स्ट डे कवर, नया सिक्का या नया नोट जारी होता है, तो उसकी गूंज सरकारी फाइलों और चुनिंदा संग्रहकर्ताओं तक ही सीमित रह जाती है। आम नागरिक न तो उसे देख पाता है, न छू पाता है और न ही उसके ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व से परिचित हो पाता है। सौ रुपये का विशेष सिक्का इसका बड़ा उदाहरण है, जिसे आज तक गिने-चुने लोगों ने ही अपनी आंखों से देखा होगा।
सूचना और उपलब्धता की इसी खाई ने जमाखोरी और मुनाफाखोरी को जन्म दिया है। कुछ लोग जानकारी के बल पर इन सरकारी वस्तुओं को संग्रह कर लेते हैं और बाद में ऊंचे दामों पर बेचते हैं। एक महापुरुष की कहानी है, जिन्होंने विदेश जाकर वहां की विदेशी मुद्रा में चलने वाले चांदी के सिक्के गलाकर उन्हें बेहद मुनाफे मे चांदी के मोल बेचा और कुबेर बन गये। पकड़े जाते, उससे पहले ही वह रफूचककर हो लिए।
सवाल यह है कि क्या सरकार सचमुच चाहती है कि राष्ट्रीय उपलब्धियों की स्मृति चिह्न सिर्फ सीमित वर्ग तक ही रहें?
यदि मंशा सबके साथ की है, तो समाधान भी स्पष्ट है। जिस तरह अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियां देश के कोने-कोने तक सामान पहुंचा सकती हैं, उसी तरह हर नया डाक टिकट, सिक्का, नोट और फर्स्ट डे कवर आम नागरिक के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से सहज रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। डाकघर, बैंक और डिजिटल प्लेटफॉर्म, तीनों को जोड़कर एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें प्रति व्यक्ति सीमा तय हो, ताकि जमाखोरी पर लगाम लगे।
26 जनवरी, मकर संक्रांति, आर्मी डे, नई ट्रेनों, स्पेस मिशन और राष्ट्रीय उपलब्धियों जैसे अवसरों पर यदि पहले से डीडी न्यूज़ के माध्यम से जानकारी दी जाए और इच्छुक नागरिक इन्हें आसानी से मंगा सकें, तो सरकारी धरोहर वास्तव में जनता की धरोहर बन जाएगी। इस व्यवस्था को ही “अमेजनवाद” कहा जा सकता है, जहां सरकार की लागत भी वसूल हो, और 140 करोड़ देशवासियों को अपने इतिहास को छूने और संजोने का अवसर भी मिले।
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