दलित राजनीति की नई पटकथा: मायावती बनाम चंद्रशेखर, 2027 से पहले ही शुरू हुई ‘वोट बैंक वॉर’

बसपा की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि आजाद समाज पार्टी जाटवों को खींचने की कोशिश कर रही है, बल्कि यह है कि दलित राजनीति में अब नई पीढ़ी बदलाव चाह रही है। बसपा की ओर से युवा नेतृत्व के रूप में आकाश आनंद को उतारा जा चुका है। चंद्रशेखर और आकाश आनंद में से कौन दलित युवाओं का हीरो होगा, यह आने वाले दिन ही तय करेंगे। फिलहाल तो यही नजर आता है कि आज की दलित समाज की युवा पीढ़ी को चंद्रशेखर का संघर्ष और स्पष्ट स्टैंड अच्छा लगने लगा है। अगर यह रुझान 2027 तक बना रहता है, तो इसका असर चुनाव में दिख सकता है।

Jul 12, 2025 - 11:51
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दलित राजनीति की नई पटकथा: मायावती बनाम चंद्रशेखर, 2027 से पहले ही शुरू हुई ‘वोट बैंक वॉर’

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। दशकों से यह वर्ग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का आधार रहा है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही इस आधार में सेंध लगाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद की अगुआई में आजाद समाज पार्टी अब खुद को बसपा की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभारने में लगी हुई है।

जहां बसपा अपने पुराने कैडर को दोबारा सक्रिय कर पुराने जनाधार को हासिल करने में लगी हुई है, वहीं आजाद समाज पार्टी ने ज़मीनी स्तर पर गांव-गांव में दलित खासकर जाटव बस्तियों में दस्तक देना शुरू कर दिया है। यह रस्साकशी अब न सिर्फ सैद्धांतिक या नेतृत्व स्तर पर है, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ता, बूथ स्तर की सक्रियता और सोशल इंजीनियरिंग तक उतर चुकी है।

आगरा में दिखने लगी हैं दोनों दलों की हलचलें

आगरा के सभी विधान सभा क्षेत्रों में आजाद समाज पार्टी की गतिविधियां जमीनी स्तर पर दिखने लगी हैं। सभी विधान सभा सीटों पर बसपा का जनाधार पहले से है। चंद्रशेखर आजाद अपने कार्यकर्ताओं के जरिए इसी जनाधार में सेंध लगाने की कोशिशें शुरू करा चुके हैं. फतेहपुर सीकरी विधानसभा क्षेत्र को ही लें, यहां एएसपी के कार्यकर्ता जाटव बस्तियों में जाकर ‘मायावती ने समाज को अकेला छोड़ दिया’ का नैरेटिव चलाते हुए चंद्रशेखर को संघर्षशील नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। बसपा के कई पुराने कार्यकर्ता आजाद समाज पार्टी से जुड़ भी चुके हैं, जबकि अन्य भी समर्थन की दिशा में झुकाव दिखा रहे हैं।

आजाद समाज पार्टी की रणनीति है कि जाटव वोटर्स, जो इस क्षेत्र में संख्या के हिसाब से दूसरे सबसे बड़े समूह हैं, को अपने पाले में लाया जाए। इसके बाद मुस्लिम मतदाताओं को पार्टी से जोड़ना चंद्रशेखर समर्थकों को ज्यादा मुश्किल नजर नहीं आता। यही चंद्रशेखर की रणनीति का केंद्र है- जाटव+मुस्लिम वोट बैंक का गठजोड़, जिसके जरिए 2027 के चुनाव में कुछ अच्छे नतीजे लाए जाएं।

चंद्रशेखर के लिए यह इतना आसान भी नहीं

हालांकि यह यह इतना भी आसान नहीं कि दलित खासकर जाटव मतदाताओं को मायावती के पाले से खींच लिया जाए। मायावती की जाटव समाज के बीच जड़ें बहुत गहरी हैं। दूसरी बात, मायावती खुद अपनी पार्टी के कील-कांटे दुरुस्त करने में लगी हुई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना से चंद्रशेखर की जीत ने दलित युवाओं के बीच एक नया चेहरा और नई भाषा जरूर दी है, लेकिन मायावती अपने पारंपरिक वोट बैंक में सेंध इतनी आसानी से नहीं लगने देंगी।

आजाद समाज पार्टी का मूल संगठनात्मक आधार, अब चुनावी मोड में आ चुका है। इसी क्रम में पार्टी के वर्कर गांव-गांव बैठकें कर रहे हैं, जिनमें युवाओं, महिलाओं और दलितों को प्रतिनिधित्व, सम्मान और संघर्ष का भरोसा दिया जा रहा है। दूसरी ओर मायावती का कैडर भी पूरी तरह एक्टिव हो चुका है, जिसका संदेश भी समाज में जा रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor