स्पीड गवर्नर के बिना न बिकेंगे, न पंजीकृत होंगे नए परिवहन वाहन- सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगी वाहन ट्रैकिंग की समयबद्ध रिपोर्ट, राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड को जल्द पूरी तरह सक्रिय करने का निर्देश
आगरा/नई दिल्ली। नए परिवहन वाहनों में गति नियंत्रक यानी स्पीड गवर्नर अब बिक्री और पंजीकरण की प्रक्रिया में अहम शर्त होगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि नियम 118 के दायरे में आने वाले परिवहन वाहनों की बिक्री, पंजीकरण और फिटनेस जांच के समय गति नियंत्रक की व्यवस्था की पुष्टि की जाए। वाहन ट्रैकिंग उपकरणों के मामले में भी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से समयबद्ध कार्रवाई और अनुपालन रिपोर्ट मांगी गई है। सड़क सुरक्षा से जुड़े इन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी वाहन पंजीकरण और फिटनेस के दौरान स्पीड लिमिटिंग डिवाइस की जांच को लेकर निर्देश दे चुका है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने 15 सितंबर 2026 को रिट याचिका सिविल संख्या 295/2012 में ये निर्देश दिए। यह मामला देशभर में सड़क सुरक्षा कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के अनुपालन से जुड़ा है।
इन मुद्दों से संबंधित याचिकाएं और अंतरिम आवेदन आगरा के सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने स्वयं तैयार कर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए। 15 सितंबर की सुनवाई में वह आवेदक के रूप में स्वयं उपस्थित हुए और अपने आवेदन तथा सुझाव पीठ के सामने रखे। आदेश में वाहन ट्रैकिंग, गति नियंत्रक और राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड से जुड़े उनके सुझावों को भी दर्ज किया गया।
स्पीड गवर्नर के बिना बिक्री पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सुनिश्चित करने को कहा है कि नियम 118 के दायरे में आने वाले परिवहन वाहन स्पीड लिमिटिंग डिवाइस या वाहन में निर्मित गति नियंत्रक व्यवस्था के बिना न बेचे जाएं। यदि कोई निर्माता या विक्रेता ऐसे वाहन बेचता है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
स्पीड लिमिटिंग डिवाइस वाहन में लगाया जाने वाला उपकरण है, जो उसे निर्धारित अधिकतम गति से आगे जाने से रोकता है। वहीं स्पीड लिमिटिंग फंक्शन वाहन के इंजन या ईंधन व्यवस्था में मौजूद ऐसी सुविधा है, जो वाहन की अधिकतम गति को सीमित करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम के दायरे में आने वाले पात्र परिवहन वाहनों में उपयुक्त गति नियंत्रक व्यवस्था होना जरूरी है।
पंजीकरण और फिटनेस में भी होगी जांच
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव अपने आरटीओ अधिकारियों को निर्देश देंगे कि नियम के दायरे में आने वाले वाहनों का पंजीकरण गति नियंत्रक लगे होने की पुष्टि के बाद ही किया जाए। केंद्र और राज्यों को यह भी बताना होगा कि नए पंजीकृत वाहनों में गति नियंत्रक लगे हैं या नहीं और नियम का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं तथा विक्रेताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई अथवा जुर्माना किया गया।
पुराने परिवहन वाहनों में नियम का अनुपालन किस तरह कराया जाएगा, इस संबंध में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शपथपत्र दाखिल करना होगा। अदालत ने फिटनेस जांच के दौरान स्वचालित जांच केंद्रों पर भी गति नियंत्रक की जांच करने की बात कही है। वाहन की डिलीवरी के समय सत्यापन की व्यावहारिक व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों पर छोड़ी गई है।
वाहन ट्रैकिंग पर राज्यों को देनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को वाहन निर्माताओं के साथ हुई बातचीत की रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। यह बातचीत सार्वजनिक सेवा वाहनों में निर्माण के समय ही वाहन ट्रैकिंग उपकरण लगाए जाने से संबंधित थी।
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वाहन ट्रैकिंग तथा आपातकालीन बटन से जुड़े नियम 125एच और मंत्रालय के 19 दिसंबर 2025 के पत्र पर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। मुख्य सचिवों को समयबद्ध और प्रभावी कदम उठाने होंगे तथा अगली सुनवाई से पहले लिए गए निर्णय और की गई कार्रवाई की जानकारी शपथपत्र के माध्यम से अदालत को देनी होगी।
जिला और राज्यवार आंकड़े सार्वजनिक करने का सुझाव
केसी जैन ने सुझाव दिया कि पात्र वाहनों, उनमें लगे ट्रैकिंग उपकरणों और गति नियंत्रकों का जिला एवं राज्यवार विवरण वाहन पोर्टल से लेकर हर महीने सार्वजनिक किया जाए। इससे यह सामने आ सकेगा कि किस जिले और राज्य में नियमों का पालन हो रहा है और कहां कमी बनी हुई है।
उन्होंने जिला सड़क सुरक्षा समितियों द्वारा इस जानकारी की हर महीने समीक्षा करने और अपनी कार्रवाई राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड को भेजने का सुझाव भी दिया। बोर्ड देशभर की स्थिति की संयुक्त रिपोर्ट समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखे। प्रत्येक ट्रैकिंग उपकरण का पहचान नंबर वाहन पोर्टल पर दर्ज करने, उसे राज्य के निगरानी केंद्र से जोड़ने और आपातकालीन संदेश संबंधित सर्वरों तक भेजने का सुझाव भी दिया गया है। अदालत ने मंत्रालय को इन सुझावों पर विचार कर उचित जवाब अथवा रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड जल्द होगा पूरी तरह सक्रिय
केंद्र सरकार ने 29 जून 2026 को राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का गठन किया था और उसकी पहली बैठक 21 जुलाई 2026 को हुई। सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड को जल्द से जल्द पूरी तरह कामकाजी बनाने पर जोर दिया है। अगली सुनवाई तक केंद्र को यह बताना होगा कि बोर्ड पूर्ण रूप से सक्रिय हुआ है या नहीं।
केसी जैन ने बोर्ड की अलग वेबसाइट बनाने, उस पर डाक पता, ईमेल और फोन नंबर उपलब्ध कराने तथा उसके फैसले, सलाह और गतिविधियां सार्वजनिक करने का सुझाव दिया। नागरिकों और सामाजिक संस्थाओं से शिकायतें एवं सुझाव लेने के लिए अलग ईमेल, ऑनलाइन स्थिति बताने वाला डैशबोर्ड और ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग भी की गई। अदालत ने बोर्ड से इन सुझावों पर जल्द विचार करने को कहा है।
उत्तर प्रदेश के गंभीर मामलों पर भी मांगी जानकारी
आदेश में उत्तर प्रदेश के उन गंभीर मोटर वाहन मामलों पर भी चिंता जताई गई है, जिन्हें राज्य के वर्ष 2023 के कानून के कारण समाप्त माना गया था। अदालत ने कहा कि समझौते से समाप्त न होने वाले अपराधों, अनिवार्य जेल की सजा वाले मामलों और बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ मुकदमा न चलाने का कोई उचित कारण नहीं है। राज्य से इस संबंध में और जानकारी मांगी गई है तथा यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि ऐसे गंभीर मामले कभी समाप्त नहीं हुए थे।
पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर भी निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट और राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के पास मथुरा रोड पार करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार को छह सप्ताह के भीतर कदम उठाने होंगे। दोनों सरकारें विशेषज्ञ नियुक्त करेंगी, जो सुरक्षित पैदल पारपथ, सिग्नल, गति कम करने और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी जैसे उपायों के संबंध में सुझाव देंगे। इसके बाद अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाएगी।
23 सितंबर को चार आवेदन होंगे सूचीबद्ध
इसी सड़क सुरक्षा मामले में केसी जैन के तीन अन्य अंतरिम आवेदन 23 सितंबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर के आदेश में निर्देश दिया है कि 23 सितंबर को केवल इन्हीं चार आवेदनों पर सुनवाई की जाए।
वाहन ट्रैकिंग, गति नियंत्रक और राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड सहित 15 सितंबर के आदेश में तय किए गए शेष विषयों पर अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी। संबंधित सरकारों और प्राधिकरणों को इससे पहले अपनी रिपोर्ट और शपथपत्र दाखिल करने होंगे।
केसी जैन ने कहा कि सड़क सुरक्षा के नियम तभी लोगों की जान बचा सकते हैं, जब उनका पालन सड़क पर दिखाई दे। उनके अनुसार, स्पीड गवर्नर और ट्रैकिंग उपकरण केवल प्रमाणपत्रों में दर्ज नहीं होने चाहिए, बल्कि वाहनों में लगे और कार्यशील भी होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जिला और राज्यवार आंकड़े हर महीने सार्वजनिक होने से कमियों की पहचान, जिम्मेदारी तय करने और सुधार में मदद मिलेगी। उन्होंने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड को ऐसा मंच बनाने की जरूरत बताई, जहां सामान्य नागरिक आसानी से अपनी शिकायत और सुझाव भेज सकें।