1971 का युद्ध: 54 साल पहले जब ताज महल को जंगल का रूप दे दिया गया था
पहलगाम के आतंकी हमले में 26 भारतीयों के मारे जाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के हालात पैदा हो चुके हैं। मंगलवार-बुधवार की रात भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान में नौ आतंकी ठिकानों पर मिसाइलें दागे जाने के बाद तो युद्ध जैसी ही स्थिति बनती दिख रही है। ऐसे माहौल में आगरा में 1971 में भारत-पाक के बीच हुए युद्ध के समय को लोग याद करने लगे हैं।
-गिरधारी लाल गोयल-
आगरा। पहलगाम के आतंकी हमले के बाद जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात बन गए हैं, तब आगरा के लोगों को दोनों देशों के बीच 1971 में हुए युद्ध के दौरान की यादें ताजा होने लगी हैं। इस युद्ध के दौरान आगरा भी प्रभावित हुआ था।
1971 के युद्ध में ताजमहल की सुरक्षा का भी विशेष ध्यान रखा गया था। ताज महल को ऐसा रूप दे दिया गया था ताकि आसमान में उड़ने वाले लड़ाकू विमान से ये जंगल का हिस्सा लगे।
ताजमहल ही नहीं, आगरा शहर की निजी ऊंची-ऊंची बिल्डिंग्स की छतों पर भी फटे पुराने या नए हरे कपड़ों से जंगल का रूप दिया गया था।
उस दौरान रात में आगरा में उड़ान भरते विमानों की आवाज और आसमान में उड़ते हवाई जहाजों की रोशनी हमारे कम से कम 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव खंदौली तक महसूस की जाती थी।
युद्ध के चौथे या शायद पांचवें दिन 8-9 बजे आगरा की ओर काफी देर तक रह-रह कर आग के गोले गिरते दिखाई दिए थे। सुबह अखबार से मालूम हुआ कि पाक विमान आकर खेरिया हवाई अड्डे की पट्टी पर बमबारी कर गए थे।
इधर अख़बारों में खबर प्रकाशित हुई, उधर खेरिया हवाई अड्डा क्षेत्र में इतनी तेजी से मरम्मत की गयी थी कि एयर फोर्स अधिकारियों ने अखबारों के संपादकों को बुलाकर पूछा कि बताओ बमबारी कहां हुई है?
इसके साथ ही अखबारों को युद्ध की खबरों को प्रकाशित करने में संयम और विवेक का प्रयोग करने की सलाह दी गयी ताकि जनता का मनोबल नहीं गिरे।
वैसे बताते हैं कि पाक विमानों ने कुछ बम गिराए थे जिनमें तीन बम हवाई पट्टी पर गिरे थे। उस युद्ध में आगरा का खेरिया हवाई अड्डा वायुसेना का प्रमुख अड्डा था।
ज्ञात रहे कि युद्ध काल आपातकाल में आता है, जिसमें सम्पूर्ण समाचार जगत को भी सावधानी बरतनी होती है।