कोई भी दुःख नहीं चाहिएः मथुरा में शिक्षकों के मन ने खोल दी समाज की मानसिक तस्वीर
यदि जीवन में एक दुःख चुनना ही पड़े, तो क्या कोई उसे स्वेच्छा से स्वीकार करेगा? मथुरा में उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षकों के साथ हुए एक अनोखे मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इसी प्रश्न के जरिए समाज के भीतर छिपी आशंकाओं, डर और मानसिक दबावों को उजागर कर दिया। इस सर्वेक्षण ने न केवल शिक्षकों के मन को टटोला, बल्कि आज के पूरे सामाजिक ढांचे की मानसिक स्थिति पर गहरी रोशनी डाली।
मथुरा। विगत 29 दिसंबर को उत्तर प्रदेश सरकार के 100 शिक्षकों के लिए आयोजित एक विशेष कार्यशाला के दौरान एक विचारोत्तेजक और भावनात्मक मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण का संचालन व्यवहार वैज्ञानिक एवं सीएससीडी (सेंटर फॉर सेल्फ एंड करियर डेवलपमेंट) के निदेशक डॉ. नवीन गुप्ता द्वारा किया गया।
सर्वेक्षण के दौरान शिक्षकों से एक सरल दिखने वाला, लेकिन भीतर तक झकझोर देने वाला प्रश्न पूछा गया। सवाल था- यदि ईश्वर ने जीवन में कम से कम एक दुःख देना निश्चित कर दिया हो, तो आप कौन-सा दुःख चुनना चाहेंगे?
इस प्रश्न से पहले प्रतिभागियों को जीवन में आने वाले संभावित दुःखों की एक सूची बनाने को कहा गया। जैसे-जैसे शिक्षकों ने अपने विचार साझा किए, समाज की मानसिक वास्तविकता साफ उभरकर सामने आने लगी।
अधिकांश शिक्षकों ने स्वास्थ्य से जुड़े दुःखों को सबसे असहनीय पीड़ा बताया। स्वयं की गंभीर बीमारी, परिवार के किसी सदस्य का मानसिक रोग, संतान की शारीरिक या मानसिक बीमारी और दिव्यांग बच्चे की कल्पना ने शिक्षकों को भावनात्मक रूप से गहराई तक प्रभावित किया।
संतान से जुड़ी पीड़ा भी एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आई। मां-पिता न बन पाने का दुःख, बच्चों का गलत संगत में फंस जाना, ऑनलाइन जुए, मोबाइल और सोशल मीडिया की लत, इन सभी को वर्तमान समय की सबसे भयावह सामाजिक चुनौतियों में गिना गया।
वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों में तनाव भी शिक्षकों की मानसिक पीड़ा का बड़ा कारण रहा। पति-पत्नी के बीच लगातार संघर्ष, विश्वासघात, विषाक्त रिश्ते और पारिवारिक दबावों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक बताया गया।
आर्थिक असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी शिक्षकों के उत्तरों में स्पष्ट झलकी। आर्थिक संकट, जीवन में अपेक्षित उपलब्धियों का अभाव और आने वाले कल का डर मानसिक तनाव को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों के रूप में सामने आए।
आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं, जैसे सोशल मीडिया की लत, ऑनलाइन जुआ, गलत संगत को भी गंभीर चिंता का विषय बताया गया। वहीं, पति-पत्नी या संतान की दुर्घटना अथवा मृत्यु को लगभग सभी ने सबसे बड़ा और असहनीय मानसिक आघात माना।
कुछ शिक्षकों ने दुःख को एक अलग नजरिये से देखा। उनके अनुसार अपने ही जीवन पर नियंत्रण न होना, निर्णय दूसरों के हाथों में चले जाना और आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता का अभाव भी गहरे मानसिक कष्ट का कारण बनता है।
सर्वेक्षण का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब शिक्षकों से दोबारा वही प्रश्न पूछा गया कि इन सभी दुःखों में से आप किसे चुनना चाहेंगे? लगभग सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में उत्तर दिया कि हम कोई भी दुःख नहीं चुनना चाहते।
यह उत्तर केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मानव मन की सबसे बुनियादी इच्छा को दर्शाता है- एक स्वस्थ, सुरक्षित और संतुलित जीवन। यह सर्वेक्षण स्पष्ट संकेत देता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक ढांचे से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है।
आज जरूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी के चश्मे से न देखा जाए, बल्कि संवेदनशीलता, समझ और सामूहिक सहयोग के माध्यम से समाज को मानसिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में ठोस और व्यावहारिक कदम उठाए जाएं।
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