नीयत नेक, लेकिन व्यवस्था कमजोरः नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल क्यों बनता जा रहा है ‘कागज़ी शेर’

पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से 2010 में गठित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से तेज और प्रभावी न्याय की उम्मीद थी, लेकिन समय के साथ इसकी सीमाएँ उजागर हो गईं। संस्थागत स्वतंत्रता की कमी, संसाधनों का अभाव, खाली पद, और फैसलों के कमजोर क्रियान्वयन ने इसकी विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। कई बड़े पर्यावरणीय मामलों में आदेश तो दिए गए, पर ज़मीन पर असर नगण्य रहा। नदियों का प्रदूषण, वायु संकट और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। अंततः स्थिति यह है कि ठोस कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जबकि NGT एक प्रभावहीन मंच बनकर रह गया है।

Apr 3, 2026 - 11:22
 0
नीयत नेक, लेकिन व्यवस्था कमजोरः नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल क्यों बनता जा रहा है ‘कागज़ी शेर’

-बृज खंडेलवाल-

आए दिन धमकी दी जाती है, एनजीटी में शिकायत कर देंगे, मुकद्दमा दर्ज होता है, मीडिया कवरेज होती है, ऑर्डर भी हो जाता है, फिर क्या होता है?

हवा घुट रही है। नदियाँ सड़ रही हैं। कचरे के पहाड़ शहरों को निगल रहे हैं। और सवाल सीधा है; न्याय कहाँ है?

2010 में एक सपना बेचा गया था। नाम- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल। कहा गया, अब पर्यावरण को अदालत में प्राथमिकता मिलेगी। तेज फैसले होंगे। विशेषज्ञ बैठेंगे। कागज़ नहीं, न्याय दौड़ेगा।

यह संस्था उम्मीद का चेहरा बनकर आई थी। लोगों ने सोचा, अब पेड़ों की भी सुनवाई होगी, नदियों को भी आवाज मिलेगी। लेकिन आज तस्वीर उलटी है। सोलह साल बाद एनजीटी एक सबक बन चुका है: अच्छी नीयत, कमजोर व्यवस्था में कैसे दम तोड़ देती है।

सबसे बड़ी दरार इसकी आत्मा में है, स्वतंत्रता की कमी। जिस मंत्रालय पर इसे नजर रखनी है, वही इसे पैसा देता है, वही स्टाफ देता है। नियुक्तियां भी वहीं से होती हैं। नतीजा? निगरानी कम, नज़दीकी ज़्यादा। 2017 के बदलावों ने इसे और कमजोर किया। रीढ़ थी, अब झुक चुकी है।

दूसरी चोट: संसाधनों की कमी। जज नहीं। विशेषज्ञ नहीं। बेंच बंद। चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर ठंडे पड़ गए। दूर बैठे लोग क्या करें? दिल्ली आएं। वक्त गंवाएं। पैसा झोंकें। न्याय अब भी दूर। नियम भी अजीब हैं। छह महीने में शिकायत करो, वरना दरवाज़ा बंद।

पर्यावरण का जख्म धीरे-धीरे दिखता है। जब तक दिखे, न्याय का समय निकल चुका होता है।

फैसलों की हालत भी अजीब है। कभी बहुत सख्त। कभी बेहद नरम। कभी व्यक्ति-आधारित। कभी हद से आगे। इससे भरोसा टूटता है। मुआवजे का खेल और भी धुंधला है। वैज्ञानिक आधार कमजोर। पैसा तय होता है, पर सही जगह नहीं पहुंचता। पर्यावरण राहत कोष तक रकम कम ही जाती है। बीच में ही रास्ता बदल जाता है। प्रक्रिया भी कटघरे में है।

सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हो रहा। यहां फैसले अक्सर समितियों को सौंप दिए जाते हैं। रिपोर्टें आती हैं। पीड़ित गायब रहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल- फैसलों को लागू कौन करेगा? एनजीटी आदेश देता है। सुर्खियां बनती हैं। तालियां बजती हैं। फाइल बंद। जमीन पर? कुछ नहीं बदलता।

याद करें कुछ महत्वपूर्ण मसले

दिल्ली वायु प्रदूषण संकट: निर्माण, वाहनों और पराली जलाने पर प्रतिबंध से PM2.5 में थोड़ी कमी आई, लेकिन दिवाली के बाद प्रदूषण फिर बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही कुछ सुधार हुआ है।

गंगा नदी प्रदूषण: दशकों से प्रदूषण रोकने के नियम और कानपुर में चमड़ा कारखाने बंद करने के बावजूद विषैले पदार्थ और मल-जनित बैक्टीरिया नहीं रुके। नदी की हालत लगातार खराब हो रही है।

यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण: नालों, कचरे और 'आर्ट ऑफ लिविंग' जैसे आयोजनों पर जुर्माने से भी यमुना साफ नहीं हो पाई। अदालती दबाव ही एकमात्र उम्मीद है।

देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन की विफलता: बिहार और शहरी लैंडफिल में कचरा निपटान के नियमों के बावजूद कचरे का ढेर लगातार बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन याचिका (ऋधिमा पांडे, 2019) की खारिजी: एनजीटी ने बच्ची की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून पर्याप्त हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनर्जीवित किया।

अवैध खनन और रेत निकासी: उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रतिबंध के बाद भी नदियों का कटाव नहीं रुका। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही कुछ पालन हुआ।

औद्योगिक मामलों में प्रक्रियागत अतिक्रमण: ग्रासिम और सिंगरौली संयंत्र मामलों में एनजीटी के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया।

ग्रेट निकोबार परियोजना: एनजीटी ने वनों, मूंगों, जनजातियों के जोखिम के बावजूद रणनीतिक जरूरतों के नाम पर परियोजना को मंजूरी दे दी।

मुआवजा राशि का उपयोग न होना: प्रदूषण और खनन मामलों में अरबों रुपये की मुआवजा राशि राहत कोष में डाले बिना गलत तरीके से खर्च हो जाती है।

पदों के खाली होने से कामकाज ठप: एनजीटी में बेंचों के खाली होने और देरी के कारण वादियों को दिल्ली जाना पड़ता है, जिससे समयबद्ध मामले अटक जाते हैं। कुछ दिन राहत। फिर वही ज़हर। आख़िर में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ही काम करती है।

सच साफ है। एनजीटी सुर्खियाँ बनाने में माहिर है। पर अमल में कमजोर। यह अदालत फाइलों में तेज है, जमीन पर बेअसर। पर्यावरण की हालत बिगड़ती गई। हवा जहरीली। नदियाँ बीमार। कचरा बेलगाम। और असली पहरेदार कौन बना? सुप्रीम कोर्ट। एनजीटी एक कागज़ी शेर।

अब भी वक्त है। इसे आज़ाद करना होगा। सरकारी पकड़ से निकालना होगा। खाली पद भरने होंगे। फैसलों को लागू करने की ताकत देनी होगी। कानूनी दायरा बढ़ाना होगा।

वरना यह संस्था इतिहास में एक पंक्ति बनकर रह जाएगी; इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी। और तब तक; हम वही हवा सांस में भरते रहेंगे, जिसमें सिर्फ धुआं नहीं, न्याय भी घुट रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor