अब लिहाज़ नहीं, लड़ाई साफ है: यूपी की दलित राजनीति में मायावती बनाम चंद्रशेखर की खुली जंग
यूपी के दो दलित नेताओं, मायावती और चंद्रशेखर के बीच का टकराव अब 'सम्मान के लिहाज' की सीमाओं को पार कर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जनाधिकार के वर्चस्व की खुली जंग में बदल चुका है। यह टकराव अब सिर्फ व्यक्ति विशेष का नहीं, दो राजनीतिक धाराओं का संघर्ष है। एक, जो विरासत के नाम पर सम्मान मांग रही है और दूसरी, जो संघर्ष के नाम पर भविष्य गढ़ने का दावा कर रही है। मायावती के लिए यह टकराव अब राजनीतिक अस्तित्व और छवि बचाने का संघर्ष बन गया है, जबकि चंद्रशेखर के लिए यह खुद को एकमात्र विकल्प के रूप में स्थापित करने का अवसर।
-एसपी सिंह-
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के दो प्रतीक चेहरों, बसपा सुप्रीमो मायावती और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद के बीच अब सत्ता और जनाधार को लेकर अब तक कायम ‘संयम की राजनीति’ की दीवारें एक-एक कर ढहती जा रही हैं।
कभी मायावती को बड़ी नेता और सम्मानित चेहरा कहकर राजनीतिक टकराव से बचते दिखने वाले नगीना के सांसद चंद्रशेखर अब उसी नेता पर सीधे सवाल उठाने लगे हैं। शब्दों में नरमी के बावजूद इशारों और बयानों की धार यह साफ बता रही है कि दलित राजनीति में नेतृत्व का संघर्ष अब परदे के पीछे नहीं, खुले मंचों पर लड़ा जा रहा है।
चंद्रशेखर का दोहरा वार, मायावती की तिहरी प्रतिक्रिया
आगरा और लखनऊ में पार्टी के दो सम्मेलनों में अपने दो सार्वजनिक संबोधनों में चंद्रशेखर ने एक ओर मायावती को समाज की बड़ी नेता कहा, वहीं दूसरी ओर यह कहकर साफ संकेत दिया कि "समाज को मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, जो मायावती पर चंद्रशेखर का सीधा हमला था।
इसके बाद चंद्रशेखर ने लखनऊ में मायावती के भतीजे आकाश आनंद को निशाने पर लेते हुए कहा कि जनता ने उन्हें नकार दिया है, मजबूरी में उन्हें पार्टी से निकाला और फिर वापस लिया गया। यह टिप्पणी भी सीधे तौर पर मायावती पर थी और दलित समाज को यह संदेश देने की कोशिश थी कि बसपा सुप्रीमो के पास अब कोई विकल्प नहीं है।
चंद्रशेखर के इन हमलों के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी चुप्पी नहीं साधी। उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर तीन हमलावर पोस्ट डालकर बगैर नाम लिए चंद्रशेखर को ‘बरसाती मेंढक’ तक कह दिया। उनके शब्दों में व्यंग्य के साथ राजनीतिक क्रोध भी स्पष्ट था। मायावती ने यह बताने की कोशिश भी की कि आकाश आनंद की पार्टी में वापसी और चीफ कोआर्डिनेटर बनना कुछ लोगों को बेचैन किए हुए है।
दलित राजनीति में नेतृत्व के लिए आमने-सामने
यूपी ही ही नहीं, देश की दलित राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती बड़ा चेहरा हैं जो पिछले तीन दशक से दलितों की एकछत्र नेता बनी हुई हैं। हालांकि पिछले एक दशक के दौरान बसपा के जनाधार में कमी आई है, लेकिन दलित समाज का एक बड़ा तबका अब भी मायावती के नेतृत्व पर भरोसा करता है।
बसपा के जनाधार में आ रही कमी का लाभ उठाकर ही चंद्रशेखर जैसे नए नेतृत्व की दस्तक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। चंद्रशेखर युवा हैं, आक्रामक हैं और सड़क पर उतरकर राजनीति करने की शैली अपनाते हैं। दलित समाज के युवा उनकी इस शैली से प्रभावित दिखते हैं। इसके विपरीत मायावती अब भी संस्थागत राजनीति, परिपक्वता और अनुशासन की बात करती हैं।
चंद्रशेखर जानते हैं कि....
आकाश आनंद के ज़रिए मायावती ने पार्टी में उत्तराधिकार की भूमिका तय करनी चाही थी, लेकिन चंद्रशेखर के निशाने पर अब वही चेहरा है, जिसे मायावती भविष्य का बसपा मानती हैं। चंद्रशेखर भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि अगर आकाश आनंद दलित राजनीति में स्थापित हो गये तो वे खाली हाथ ही रह जाएंगे। मौके की नजाकत को समझते हुए चंद्रशेखर 2027 में यूपी की सभी विधान सभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
मायावती का अनुभव और इतिहास अब तक उनकी ढाल रहा है, लेकिन चंद्रशेखर का आक्रामकता के साथ दलित समाज को अब एक नए किस्म की नेतृत्व शैली को स्वीकारने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। देखना यह है कि चंद्रशेखर 2027 की चुनावी समरभूमि में क्या करिश्मा दिखा पाते हैं।