अब कोई उम्मीद नहीं बचीः तंजीन का एक वाक्य, जो समाजवादी पार्टी की आत्मा को हिला गया
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खां की पत्नी तंजीन फातिमा के एक वाक्य के बयान ने समाजवादी पार्टी के लिए मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। तंजीन ने कहा था- अब उन्हें समाजवादी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं है। उकका यह बयान एक राजनीतिक चेतावनी के रूप में भी देखा जा रहा है। क्या अखिलेश यादव और आजम खां की दरार अब सतह पर नहीं, जड़ों तक पहुंच चुकी है। यदि समाजवादी पार्टी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, तो 2027 का विधानसभा चुनाव नेतृत्व के लिए चुनौती बन जाएगा।
-आजम खां की चुप्पी टूटी तंजीन की आवाज़ में, क्या यह मुस्लिम जनाधार पर सपा के लिए खतरे की घंटी है
लखनऊ। ‘अब हमें समाजवादी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं।‘ यह वाक्य एक पत्नी की पीड़ा मात्र नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की सबसे मजबूत आवाज़ के पूरी तरह टूट जाने की स्वीकृति है। आजम खां की पत्नी और पूर्व सांसद तंजीन फातिमा ने जब यह कहा तो शब्दों से अधिक उनके पीछे की चुप्पी बोली। और वह चुप्पी आजम खां की वर्षों की नाराज़गी, उपेक्षा और अलग-थलग छोड़ दिए जाने की दास्तान थी।
तंजीन फातिमा ने यह बयान सीतापुर जेल में बंद आजम खां से मुलाकात करने के बाद दिया। इस बयान ने न केवल सपा के भीतर हलचल पैदा कर दी है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है: क्या समाजवादी पार्टी अपने सबसे भरोसेमंद मुस्लिम चेहरे को धीरे-धीरे खो चुकी है?
सालों की चुप्पी एक वाक्य में विस्फोट बनकर फूटी
आजम खां पर दर्जनों की संख्या में मुकदमे दर्ज हैं। लगभग तीन साल जेल में काटने के बाद वे जब जमानत पर बाहर आए थे, तभी उन्होंने शेरो शायरी के जरिए इशारों-इशारों में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर दी थी। नाराजगी शायद इस बात को लेकर थी कि जब उन पर मुकदमे दर्ज हो रहे थे, तब पार्टी ने उनके के लिए संघर्ष नहीं किया। तब पार्टी ने केवल औपचारिक सहानुभूति जताई थी। तंजीन फातिमा का यह बयान उसी क्षोभ का सार्वजनिक विस्फोट है, जिसे आजम खां के समर्थक वर्षों से महसूस कर रहे थे।
'कंधे से कंधा' तो छोड़िए, परछाई तक नहीं
जब आजम खां को सिस्टम ने कठघरे में खड़ा किया, तो पार्टी ने उन्हें राजनीतिक रूप से अकेला छोड़ दिया। उनके समर्थक साफ तौर पर आरोप लगाते रहे हैं कि अखिलेश यादव ने जानबूझकर दूरी बनाए रखी। यह धारणा अब इतनी गहरी हो चुकी है कि जब अखिलेश अल्पसंख्यक सम्मेलन में बोले कि पार्टी आजम खां के साथ है, तो आजम समर्थकों को वह सिर्फ एक चुनावी मजबूरी की राजनीति लगने लगी।
आजम खां को भूलाकर किसे गढ़ा जा रहा है?
आजम खां, उनके परिवार और उनके समर्थकों को लग रहा है कि अखिलेश यादव आजम खां के समानांतर एक 'नई मुस्लिम लीडरशिप' तैयार कर रहे हैं। रामपुर में उनके विरोधी माने जाने वाले मोहिबुल्लाह नदवी को टिकट देकर उस रामपुर का सांसद बनाना, जहां आजम खां का सिक्का चलता था, यह आजम समर्थकों को सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि एक जानबूझकर दूरी बनाने की प्रक्रिया लगती है।
अखिलेश की ‘बेचारगी’ या राजनीतिक विवशता?
तंजीन के बयान पर अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया- ‘हम क्या कर सकते हैं, भाजपा सरकार अन्याय कर रही है’, एक बेचारगी की तरह सामने आई। हां, वे यह कहना नहीं भूले कि भाजपा सरकार ने मुकदमे लादे हैं। आजम खां को राहत तभी मिल सकती है जब हमारी सरकार बने, इसलिए हमारी सरकार बनाओ।
आजम के लिए सीएम नहीं, मुलायम के बेटे थे अखिलेश
यहां यह बताना जरूरी है कि आजम खां सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के हमराही रहे हैं। मुलायम सिंह यादव जितना आजम खां पर भरोसा करते थे, उसी तरह का रिटर्न आजम खां ने समाजवादी पार्टी को दिया था। 2012 में जब आजम खां अखिलेश यादव की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने थे, तब भी वे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के बजाय मुलायम सिंह यादव के बेटे के रूप में ही देखते थे। शायद यही बात अखिलेश यादव को पूरे पांच साल तक खटकती रही। जब भाजपा सरकार ने आजम खां को घेरना शुरू किया, तब सपा की चुप्पी की एक वजह यह भी मानी जा रही है।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद मौका नहीं चूक रहे
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद लगातार आजम खां के प्रति लगातार हमदर्दी दिखा रहे हैं। यह घटनाक्रम इस बात की आहट है कि अगर आजम खां और उनका समर्थक वर्ग सपा से इसी तरह नाराज बना रहा तो मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस या अन्य दलों की ओर मुड़ सकता है। इस तबके में भावनात्मक जुड़ाव का जितना महत्व है, उतना शायद किसी अन्य समुदाय में नहीं।