सीमांचल में फिर बजे ओवैसी के नगाड़े: लालू-तेजस्वी की ‘ठेंगा’ वाली गलती ने बदला चुनावी गणित

बिहार के चुनाव में एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के लिए यह चुनाव केवल वोट और सीटों की लड़ाई नहीं थी, यह राजद के अहंकार और ओवैसी के आत्मसम्मान की टक्कर थी। सीमांचल ने अपने ‘असद’ को चुना, और महागठबंधन ने ‘संभावना’ को ठुकराकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली।

Nov 15, 2025 - 14:44
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सीमांचल में फिर बजे ओवैसी के नगाड़े: लालू-तेजस्वी की ‘ठेंगा’ वाली गलती ने बदला चुनावी गणित

जब राजनीति ने दिखाया ‘धोबी पाट’: ओवैसी ने फिर करवाया सीमांचल का शक्ति प्रदर्शन

बिहार विधानसभा चुनाव में जो नतीजे आए हैं, उन्होंने बिहार की राजनीति में एक बार फिर दिखा दिया कि सीमांचल की जमीन पर अदाकारी करने वाले असदुद्दीन ओवैसी को हल्के में लेना सिर्फ मूर्खता नहीं, बल्कि चुनावी आत्मघात है। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीमांचल की पांच सीटें अपने नाम की थीं, जो उनके लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी। हालांकि, इस उपलब्धि पर तब चोट तब पहुंची, जब चुने गए चार विधायक राजद के पाले में चले गए। इस घटना ने ओवैसी के मन में चोट पहुंचाई, और उन्होंने इसे अपनी राजनैतिक बेइज्जती माना और इस चुनाव में इसका हिसाब बराबर कर लिया।

राजद की चूक: ‘छह सीटों’ की हिचक, बनी लाखों वोटों की चूक

इस बार चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी ओर से राजद नीत महागठबंधन में शामिल होने की पेशकश की। वे सिर्फ पांच या छह सीटों पर ही समझौता चाहते थे। लेकिन, राजद ने ओवैसी को सिरे से नकार दिया। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की ओर से उन्हें यह भी कह दिया गया कि यदि वे सच में भाजपा को रोकना चाहते हैं, तो बिहार छोड़कर चले जाएं। यह सिर्फ ठुकराना नहीं था, बल्कि एक तरह से चुनौती थी, जिसने ओवैसी के राजनीतिक अस्मिता पर सीधे हमला किया।

चुनावी मानचित्र पर राजद की इस ठेंगा नीति का परिणाम अब साफ दिख रहा है। महागठबंधन, जिसमें राजद और कांग्रेस सबसे मजबूत भागीदार थे, उनके प्रत्याशी तमाम सीटों पर पिछड़ गया जहां एआईएमआईएम ने अपने प्रत्याशी उतारे थे। ओवैसी ने अधिकार से कहा था- मैं भिड़ने आया हूं और चुनाव परिणामों ने इसे सच कर दिया।

ओवैसी का अकेला रण: सीटें वही, लेकिन इस बार हक़ और आवाज़ दोनों बुलंद

न सिर्फ 2020 की तरह इस बार भी एआईएमआईएम ने सीमांचल की पांच सीटें झटक लीं, बल्कि इस बार उनके उम्मीदवार कई सीटों पर तीसरी और चौथी पोजिशन पर रहे, पर विपक्षी वोटों में कटाव कर गए। ओवैसी ने कुल मिलाकर 25 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, जिनमें से कई ऐसे क्षेत्र थे जहां मुस्लिम-यादव समीकरण महागठबंधन की ताकत माना जाता था। परंतु ओवैसी ने इन समीकरणों को ही ध्वस्त कर दिया।

उनके उम्मीदवारों ने जहां हार भी मानी, वहां उन्होंने महागठबंधन की जीत के रास्ते में कांटे जरूर बिछा दिए। ये कांटे ही थे, जो कई सीटों पर राजद और कांग्रेस की संभावित जीत को भट्टी में जला गए।

ओवैसी की राजनीतिक चोटः महागठबंधन ने चुकाई बड़ी कीमत

ओवैसी की राजनीतिक चाल में भावनाओं की परत भी थी। 2020 में जो दगा उन्हें मिला था, उसके जवाब में उन्होंने इस बार तल्खी के साथ चुनाव लड़ा। चुनाव लड़ने नहीं, सिखाने आया हूं, यह संदेश उन्होंने संकेतों में हर रैली से दिया। उन्होंने रैलियों में कहा भी, मुझे लोग वोट नहीं देते, मौका देते हैं हवा बदलने का।

राजद-कांग्रेस ने सीमांचल की सियासी पकड़ भी ढीली कर दी

यह अब स्पष्ट हो गया है कि महागठबंधन की रणनीतिक गलती ने उसे न सिर्फ तमाम सीटों का नुकसान कराया, बल्कि सीमांचल में उनकी पहचान और पकड़ भी कमजोर की है। यह सिर्फ सीटों का नुकसान नहीं है, बल्कि भविष्य की राजनीति में जगह खोने की शुरुआत है।

बिहार की राजनीति ने एक बार फिर साबित किया है कि गठबंधन में सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि सम्मान और समझदारी भी बराबर जरूरी है। ओवैसी ने इस चुनाव में साबित किया कि सीमांचल में उनकी जड़ें सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी हैं और जड़ों को नजरअंदाज करने वाले पेड़ का गिरना तय है।

SP_Singh AURGURU Editor