गांधीवाद की लौ से लोकतंत्र की राह: आगरा कॉलेज की राष्ट्रीय संगोष्ठी में गूंजे समकालीन सरोकार

आगरा। आगरा कॉलेज, आगरा के राजनीति विज्ञान विभाग ने ‘गांधीवाद और लोकतंत्र का वर्तमान वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर आयोजित एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कई सत्रों में हुई बहसों ने रेखांकित किया कि लोकतंत्र का नैतिक पुनर्संयोजन सत्य-अहिंसा, नागरिक भागीदारी, आर्थिक न्याय, सामाजिक-सांस्कृतिक समावेशन और वैश्विक उत्तरदायित्व आज भी गांधीवादी दृष्टि से संभव व आवश्यक है। प्रतिभागियों ने इसे समकालीन लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण हेतु एक सार्थक मंच माना।

Aug 28, 2025 - 19:55
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गांधीवाद की लौ से लोकतंत्र की राह: आगरा कॉलेज की राष्ट्रीय संगोष्ठी में गूंजे समकालीन सरोकार
आगरा कॊलेज में आयोजित संगोष्ठी का उद्घाटन करते अतिथिगण।

कॊलेज के ऑडिटोरियम-1 में इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्राचार्य प्रो. सी. के. गौतम ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में गांधीवादी विचारों की आज की प्रासंगिकता रेखांकित करते हुए याद दिलाया कि महात्मा गांधी 1929 में आगरा कॉलेज आए थे और तत्कालीन मेस्टन हॉल (वर्तमान गंगाधर शास्त्री भवन) में आगरा कॉलेज व सेंट जॉन्स कॉलेज के विद्यार्थियों को राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत किया था।

उद्घाटन, स्वागत और रूपरेखा

संगोष्ठी में स्वागत भाषण राजनीति विज्ञान विभाग के प्रभारी एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. मृणाल शर्मा ने किया और कार्यक्रम के उद्देश्यों और गांधीवादी दृष्टि से समकालीन लोकतांत्रिक चुनौतियों की व्याख्या को स्पष्ट किया। प्रो. सीमा सिंह ने विभाग की शैक्षिक उपलब्धियों व शोध गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।

प्रो. शशिकांत पांडे ने विमर्श की रूपरेखा रखते हुए पांच प्रमुख चर्चा-बिंदु सामने रखे, जिनके इर्द-गिर्द पूरे दिन विचार-विमर्श चला। ये बिंदु थे- सत्य–अहिंसा बनाम सत्ता-केन्द्रित लोकतंत्र: नैतिक राजनीति की अनिवार्यता। जनसहभागिता बनाम प्रतिनिधित्व संकट: लोकतंत्र में नागरिक की सक्रिय भूमिका। आर्थिक असमानता व ग्रामस्वराज: पूँजी व बाजार के वर्चस्व पर गांधी का विकल्प। सांस्कृतिक विविधता, सहिष्णुता व धर्मनिरपेक्षता: पहचानों की राजनीति से परे समावेशन। वैश्विक चुनौतियाँ (जलवायु, युद्ध, शरणार्थी, तकनीकी निगरानी) पर गांधी का वैकल्पिक दृष्टिकोण।

गांधीजी को हर व्यक्ति की आजादी चाहिए थी- प्रो. हेमंत शाह

मुख्य अतिथि लेखक, पत्रकार एवं पूर्व प्राचार्य, एच.के. आर्ट कॉलेज, अहमदाबाद प्रो. हेमन्त कुमार शाह ने कहा कि गांधी को केवल देश की नहीं, हर व्यक्ति की आज़ादी चाहिए थी। राष्ट्र-स्वाधीनता पर्याप्त नहीं, व्यक्ति-स्वराज लोकतंत्र का प्राण है। अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिकार ही गांधीवाद का सार है; हमें 146 करोड़ नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी है।

गांधी जी को संकटों का पूर्वाभास था- प्रो. अरुण

लेखक, पत्रकार एवं प्रोफेसर, आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी ने रेखांकित किया कि असमानता, संकीर्णता, मूल्यहीन राजनीति और संग्रह-लालसा जैसे संकटों का पूर्वाभास गांधी जी को था। उन्होंने विचार ही नहीं, जीवन-आचरण से वैकल्पिक रास्ते दिखाए। लोकतंत्र को मानवीय, सतत और नैतिक बनाने के लिए यही मार्गदर्शन आज सर्वाधिक प्रासंगिक है।

बापू के विचार अत्यंत व्यवहारिक- प्रो. अरुणोदय

आगरा कॊलेज के राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अरुणोदय वाजपेयी  ने कहा कि गांधी के विचार ‘आदर्शवादी’ या ‘यूटोपियन’ भर नहीं, अत्यंत व्यवहारिक हैं। आज़ादी के आंदोलन से लेकर लोकतंत्र की संस्थागत तैयारी तक, उन्होंने कांग्रेस के एलीट रंग को जन-लोकतांत्रिक स्वरूप में बदला। सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बुनियाद का बीज भी गांधी ने ही रोपा।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. दिग्विजय नाथ राय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. संतोष कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया। संपूर्ण व्यवस्थाएँ डॉ. सुरेंद्र पाल सिंह एवं डॉ. विकास सिंह ने सुचारु रूप से संभालीं।

संगोष्ठी में मौजूद रहे शिक्षक और शोथार्थी

प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी (प्रो. मृणाल शर्मा (विभागाध्यक्ष), प्रो. सीमा सिंह, प्रो. संतोष कुमार सिंह, डॉ. शशिकांत पांडे, डॉ. स्वतंत्र कुमार (विरू सुमन), डॉ. सुरेंद्र पाल सिंह, डॉ. विकास सिंह, डॉ. बी.के. चिकारा, डॉ. गौरव कौशिक, डॉ. उमाकांत चौबे, प्रो. अंशु चौहान, प्रो. नेहा राठौर, डॉ. मनीष दोहरे, डॉ. अरविंद गुप्ता, डॉ. आनंद प्रताप सिंह, डॉ. जिनेश कुमार सिंह, प्रो. जयश्री भारद्वाज, प्रो. संध्या यादव, प्रो. वाई.एन. त्रिपाठी, प्रो. अमिता सरकार, डॉ. राम प्रकाश पाल, प्रो. राम विजय सिंह सहित अनेक प्राध्यापक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

SP_Singh AURGURU Editor