पितृपक्ष: पूर्वजों को स्मरण और आशीर्वाद पाने का अवसर, जानिए पितरों की तृप्ति का महत्व

श्रद्धा शब्द का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य। पितरों के कार्यों को श्रद्धा और भक्ति भाव से करना ही श्राद्ध  कहलाता है। शास्त्रों में पितरों को संतान का मूल कारक और जीवन की जड़ माना गया है। जब पितरों को प्रसन्न किया जाता है तो परिवार में सुख-समृद्धि और संतति की वृद्धि होती है।

Sep 7, 2025 - 09:12
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पितृपक्ष: पूर्वजों को स्मरण और आशीर्वाद पाने का अवसर, जानिए पितरों की तृप्ति का महत्व

श्राद्ध पक्ष का पौराणिक संदर्भ

महाभारत में एक कथा आती है कि आस्तिक के पिता जारत्कारू ने अपने पितरों को उल्टा लटका हुआ देखा। जब उन्होंने पूछा कि आप कौन हो और इस प्रकार इस दशा में क्यों हो तो उन्होंने बताया कि हम तुम्हारे पूर्वज हैं। तुमने विवाह नहीं किया और हमें तर्पण जल नहीं देते हो,इसी वजह से इस स्थिति में कष्ट भोग रहे हैं। तब जारत्कारू ने एक कन्या से विवाह किया, जिससे आस्तिक का जन्म हुआ। आस्तिक ने ही आगे चलकर राजा जनमेजय का सर्प यज्ञ रुकवाया। यह कथा बताती है कि पितरों को तर्पण और श्राद्ध द्वारा संतुष्ट करना संतान के लिए कितना आवश्यक है।

इस बार पितृपक्ष की अवधि 15 दिन

भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन अमावस्या तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष को पितृपक्ष कहते हैं। कुल 16 श्राद्ध होते हैं, जिनमें 15 श्राद्ध अश्विन कृष्ण पक्ष के और 1 श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा का होता है। इस बार पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर तक (15 दिन) रहेगा। इसकी वजह यह है कि 11 सितम्बर को श्राद्ध पक्ष की चतुर्थी और पंचमी एक ही दिन है। 11 सितम्बर को सूर्योदय से दोपहर 12 बजकर 45 मिनट तक चतुर्थी रहेगी। इसके बाद पंचमी तिथि रहोगी जो 12 सितंबर को सुबह 9 बजकर 58 मिनट तक रहेगी।

श्राद्ध कर्म के नियम

इस दौरान नए वस्त्र, आभूषण या कोई नई वस्तु घर में नहीं लानी चाहिए। नवीन कार्य, गृह प्रवेश, विवाह, शुभ संस्कार आदि वर्जित रहते हैं। श्राद्ध में सफेद वस्त्र पहनना, पवित्र जल से स्नान करना और आचरण शुद्ध रखना चाहिए। तर्पण में कुशा, तिल, जौ और दूध का प्रयोग करना चाहिए। पितरों की तिथि पर उनके निमित्त पिंडदान और तर्पण किया जाता है। श्राद्ध में योग्य ब्राह्मण को भोजन कराना सबसे श्रेष्ठ है। यदि ब्राह्मण न मिले तो गाय को भोजन कराना भी शास्त्रसम्मत है।

ऐसे करें श्राद्ध

स्थान चयन – श्राद्ध किसी पवित्र स्थल, नदी तट, तीर्थ, मंदिर अथवा घर के आंगन में भी किया जा सकता है।

संकल्प – संकल्प लेकर पितरों का नाम, गोत्र और तिथि उच्चारण करें।

पिंडदान – चावल, जौ, काले तिल और घी से बने पिंड धरती पर या कुशा पर रखकर पितरों को अर्पित करें।

तर्पण – कुशा की अंगुली से जल में तिल डालकर पितरों के नाम का आह्वान करते हुए जल अर्पित करें।

भोजन – योग्य ब्राह्मण को आदर सहित भोजन कराएं, वस्त्र-दक्षिणा दें। ब्राह्मण न मिले तो गाय, कुत्ते, कौवे को भी भोजन कराया जा सकता है।

दान – अन्न, वस्त्र, छाता, जूते, धान्य, स्वर्ण अथवा अपनी सामर्थ्य अनुसार वस्तुएं दान दें।

प्रार्थना – अंत में हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करें कि हमारे द्वारा किया गया यह श्राद्ध हमारे पितरों को तृप्त करे और हमें आशीर्वाद प्रदान करें।

पितरों को तृप्त करता है श्राद्ध

पितृपक्ष में किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग में तृप्त करता है। यह कर्म पितृ दोष से मुक्ति दिलाता है और वंश वृद्धि के मार्ग खोलता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध करने से पूर्वज प्रसन्न होकर संतान को आयु, आरोग्य, धन, संतान और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में एक दिन भी तर्पण न करने से पितरों की तृप्ति अधूरी रहती है और परिवार में विघ्न उत्पन्न होते हैं।

ये सावधानियां बरतें

इस काल में मांसाहार, मद्यपान और अनैतिक कार्यों से दूर रहें। घर में कलह, झगड़ा, अपशब्द और अपवित्रता नहीं होनी चाहिए। गर्भवती स्त्रियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध कर्म न केवल पितरों की आत्मा को शांति देता है, बल्कि जीवित संतति को भी सुख-समृद्धि, आरोग्य और शांति प्रदान करता है।

 

SP_Singh AURGURU Editor