मातृभाषा में न्याय का संकल्प: आगरा कॉलेज के विधि संकाय में गूंजा हिंदी में विधि शिक्षा का स्वर, न्यायिक व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाने पर हुआ गहन विमर्श
आगरा। विधि शिक्षा और न्याय को आमजन से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए आगरा कॉलेज, आगरा के विधि संकाय में शुक्रवार, को मातृ भाषा में विधि शिक्षा एवं न्याय विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी भारतीय भाषा अभियान के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस (पखवाड़ा) के अवसर पर आयोजित की गई, जिसमें विधि शिक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और मातृभाषा के गहरे अंतर्संबंधों पर विस्तार से मंथन हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम ने की। मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व जिला जज गोपाल कुलश्रेष्ठ उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता रहे प्रोफेसर अरविंद मिश्रा, पूर्व ओएसडी, राज्यपाल उत्तर प्रदेश एवं पूर्व संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष, विधि विभाग, आगरा कॉलेज। विशिष्ट अतिथियों में राजेश कुलश्रेष्ठ, पूर्व डीजीसी (सिविल), आगरा तथा श्रीमती अंजलि वर्मा, एडीजीसी (सिविल), आगरा सम्मिलित रहीं।
कार्यक्रम की संयोजिका प्रोफेसर रीता निगम ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया, जबकि विधि छात्रा झील गौतम ने पूरे कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन किया।
संगोष्ठी का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। स्वागत उद्बोधन प्रोफेसर मोअज्जम खान ने दिया। उन्होंने कहा कि जब तक न्याय की भाषा आमजन की भाषा नहीं होगी, तब तक न्याय की अनुभूति अधूरी रहेगी। वर्तमान में विधिक नजीरें और साहित्य अंग्रेज़ी में होने से आम नागरिक स्वयं को न्यायिक प्रक्रिया से दूर महसूस करता है। इसलिए विधि शिक्षा और न्यायिक कार्यवाही को मातृभाषा में सशक्त बनाना समय की मांग है।
मुख्य अतिथि पूर्व जिला जज गोपाल कुलश्रेष्ठ ने कहा कि जिला न्यायालयों में हिंदी के व्यापक प्रयोग से न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुलभ हुई है। मातृभाषा में आदेश मिलने से पक्षकार सक्रिय रूप से प्रक्रिया में भागीदारी कर पाता है।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर अरविंद मिश्रा ने कहा कि मातृभाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न भी है। मातृभाषा में विधि शिक्षा से विद्यार्थी अधिक आत्मविश्वासी और व्यवहारिक बनते हैं। उन्होंने विधिक पारिभाषिक शब्दावली के मानकीकरण और संस्थागत समन्वय पर विशेष जोर दिया।
श्रीमती अंजलि वर्मा ने बताया कि भारतीय भाषा अभियान वर्ष 2012 से प्रारंभ हुआ, जिसका उद्देश्य न्यायिक व प्रशासनिक कार्यों में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजभाषा हिंदी है और अधीनस्थ न्यायालयों में हिंदी में आदेश पारित किए जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 348 में संशोधन की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि वादपत्र और अभ्यावेदन मातृभाषा में स्वीकार किए जाने चाहिए। साथ ही, उन्होंने हस्ताक्षर, पत्राचार और नेम प्लेट तक में मातृभाषा के प्रयोग का आह्वान किया।
राजेश कुलश्रेष्ठ ने कहा कि भाषा पर गर्व ही सांस्कृतिक पहचान की नींव है। हिंदी में निर्णय होने से पक्षकार स्वयं आदेश पढ़ और समझ सकता है, जिससे भ्रम और शोषण की संभावना कम होती है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय में हिंदी याचिकाओं के बढ़ते प्रयोग का उल्लेख करते हुए अनुवाद प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता बताई।
प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम ने कहा कि राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र का सम्मान जुड़ा है। हिंदी में निर्णय पारित होना सकारात्मक बदलाव है, जो राष्ट्रीय एकात्मता और बौद्धिक स्वाभिमान को सुदृढ़ करता है।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। आभार ज्ञापन प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा, विभागाध्यक्ष, विधि संकाय ने किया।
संगोष्ठी में प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा, प्रोफेसर एम. एम. खान, प्रोफेसर रीता निगम, प्रोफेसर उमेश कुमार, प्रोफेसर गौरव कौशिक, प्रोफेसर संजीव शर्मा, प्रोफेसर रिजु निगम समेत बड़ी संख्या में शिक्षकगण मौजूद रहे।